Sunday, June 14, 2026

दिव्यास्त्र तो बन रहे है परंतु बच्चों की दिव्यता का पोषण नहीं हो रहा?

 



शिव कृपा करो
शिव आज्ञा दो
श्रीवाग्नि प्रवाहित होने।
प्रणाम,
दिव्यास्त्र तो बन रहे है परंतु बच्चों की दिव्यता का पोषण नहीं हो रहा?
दिव्यता के पोषण हेतु शिक्षा नहीं विद्या देनी चाहिए। बच्चों को साक्षर नहीं सरस बनाना है।
ज्ञान का विज्ञान जाने बिना बच्चों की दिव्यता उजागर नहीं हो सकती। दिव्यता बुद्धि में नहीं विवेक के केंद्र बिंदु में होती है। सुनने, बोलने, लिखने, पढ़ने में बिंदु को प्रकाशित होना चाहिए।
बिंदु के केंद्र में पहुंचने के लिए केंद्रित होने की आवश्यकता है।
अनुशासन के बिना केंद्रित होना संभव नहीं। अनुशासन का अर्थ ही अपने अणु अणु पर शासन करना है। यदि बच्चे अपने केंद्र को नहीं थाम पाए तो उनकी दिव्यता व्यर्थ व्यय हो जाती है।
दिव्य होने के लिए सदी के महासंदेश सत्य से प्रेम, प्रेम से कर्म करें।
प्रसंग प्रणाम से प्रणव तक सत्य की विजय यात्रा में भाग लें।
Look beyond imperfections
Be 'PRASANG' Be Joyous
रेणु वशिष्ठ
मेरी काया मेरी वेधशाला से
9फरवरी 2026

Saturday, June 13, 2026

 



आदि श्रीशंकराचार्य जी के पिता श्रीशिवगुरु ग्राम में ही विद्यमान कात्यायनी देवी का नित्य पूजन करते थे।
स्वादिष्ट गोदुग्ध का भोग लगाने के अनन्तर अवशिष्ट दुग्ध पुत्र को देते थे, देवी का प्रसाद समझकर बालक ग्रहण करता था ।
एक दिन पिता को किसी आवश्यक कार्य से कुछ दिनों के लिए बाहर जाना पड़ा । उन्होंने पत्नी को पूजन तथा दुग्ध भोग लगाने की आज्ञा दी । माता जी अवशिष्ट प्रसाद बालक को देती थी । बीच में वह मासिक धर्म से युक्त हुई, तब बालक को बुलाकर भगवती का पूजन करने के लिए दुग्ध दिया ।
बालक ने देवी के मंदिर में जाकर भक्तिपूर्वक देवी को स्नान करवाकर माता द्वारा दिया हुआ दुग्ध जगदम्बा के आगे रखकर पीने की प्रार्थना की ।
दुग्ध को ज्यूँ का त्यूँ देखकर, 'अम्बा कुपित हो गई हैं इसीलिए ग्रहण नहीं करती' यह सोचकर बाल भाव से आचार्य रुदन करने लगे । इनके आगे पार्वती जी प्रकट हुई और स्वर्ण पात्रस्थ दुग्ध लेकर पीने लगी ।
पात्र को पूरा खाली होते हुए देखकर उन्होंने कहा-- "हे अम्ब ! क्या सब पी जाओगी ?, हमे नहीं दोगी ?" हठ करते हुए अब और रुदन करने लगे । तब बाल-वत्सला जगदम्बा ने बालक को गोद में लेकर दुलार करती हुई अपना स्तनपान कराने लगी । उस दुग्ध में ज्ञान, वैराग्य तथा काव्य धारा भरी थी । यह आचार्य की कुलदेवी थी ।
जगदम्बा के दाहिने स्तन से ज्ञान और वैराग्य की धारा तथा बाएं स्तन से काव्य धारा प्रवाहित हुई । इसी भाव को व्यक्त करते हुए आचार्यपाद ने "सौंदर्य लहरी" के ९७वें श्लोक में कहा है । इस ग्रँथ पर सौभाग्यवर्धिनी, अरुणामोदिनी,आनंदगिरीय तथा भास्कर राय की व्याख्याएं है ।~~
"हे अम्ब ! आपका यह द्रविड़ शिशु आपके स्तनपान के प्रभाव से ही ज्ञान-वैराग्य को प्राप्त करके काव्य रचना करने में सक्षम हुआ है ।"
भगवती के प्रकट होने पर भक्तिपूर्वक स्तुति करके पूजा समाप्त की । देवी मंदिर से निकलकर आचार्य अपनी माता के साथ घर पहुंचे । कुछ दिनों बाद पिता जब लौटकर आये तब बालक का तेज देखकर अति विस्मय को प्राप्त हुए ।
भगवती ने आकाशवाणी द्वारा कहा-- "आपका यह पुत्र साधारण बालक नहीं है, बल्कि स्वामी कार्तिक ही तुम्हारे पुत्ररूप में है, इसमें संदेह नहीं है । अथवा विष्णु ने ही बालक रूप धारण किया है या सत्यवती नंदन भगवान व्यास ही इस बालक के रूप में विद्यमान है ।" इस प्रकार देवी ने प्रशंसा की।

 



शिव कृपा करो,

शिव आज्ञा दो,
शिवाग्नि प्रवाहित हो,
प्रणाम ॐ
स्कूलों में शिक्षा दी जाती है, विद्या तो माता पिता ही अपने सत्कर्म से दे सकते हैं।
वाहन बनाना, चलाना,हवाई जहाज बनाना, उड़ाना सब कुछ विद्यालयों, विश्वविद्यालयों में सिखाया जा रहा है परंतु जीवन गाड़ी को चलाने वाली आत्मा को पोषित करने के लिए माता पिता ही प्रथम शिक्षक/गुरु हैं और परिवार पहली पाठशाला।
प्रश्न उठता है, आजकल के बच्चे सुनते नहीं?
सही बात है, इस सही बात को सही कैसे किया जाए?
सदी का महासंदेश यही कहता है सत्य से प्रेम, प्रेम से कर्म करें।
प्रसंग प्रणाम से प्रणव तक सत्य की विजय यात्रा में भाग लें।
Look beyond imperfections
Be 'PRASANG' Be Joyous
रेणु वशिष्ठ
मेरी काया मेरी वेधशाला से
Prasang Vashistha Charitable Trust एवं Bakhal Pre School Curriculum Researchers Pvt. Ltd. कटिबद्ध है चरित्र निर्माण से राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान देने हेतु।
आप भी सहयात्री बने।

 विद्वत्वं दक्षता शीलं सङ्क्रान्तिरनुशीलनम् ।

शिक्षकस्य गुणाः सप्त सचेतस्त्वं प्रसन्नता ।
शक्षक के सप्त गुण होते हैँ । यह है – विद्वता (knowledge), शिष्य के ग्रहणशक्ति के अनुसार शिक्षा देने के दक्षता (teaching skill), उत्तम चरित्र (integrity), अपने मन के भाव (विचार) को शिष्य के मन में प्रवेश कराने की योग्यता (communication skill), सब विषय में सचेतनता (carefulness), तथा प्रसन्नता (pleasant personality)

 



प्राचीन भारतीय शिक्षा में मेधा शक्ति बढ़ाने के लिए ध्वनि विज्ञान का सहारा लिया जाता था। मंत्र की शक्ति तंत्र (शरीर, मस्तिष्क) पर सुप्रभाव डालती थीं। अक्षर और शब्द ब्रह्म एक पूर्ण विज्ञान हैं, हावर्ड और टाइम मैगजीन की ट्रिक से कहीं बेहतर। आधुनिक विज्ञान अधूरा ज्ञान लिए अज्ञानता की ओर बढ़ रहा है। प्राचीन भारतीय ज्ञान पूर्ण विज्ञान है। मेधा शक्ति बढ़ाने हेतु छोटा सा प्रयोग करके देखें रात को सोते समय तीन बार शिव शिव शिव बोलें और सुबह जब उठें तो तीन बार नारायण नारायण नारायण बोले।

करके देखें।
क्या?
सदी के महासंदेश सत्य से प्रेम, प्रेम से कर्म करें।
प्रसंग प्रणाम से प्रणव तक सत्य की विजय यात्रा में भाग लें।
हावर्ड और टाइम मैगजीन की ट्रिक आपके mind को ट्रेन करेगी जबकि प्राचीन भारतीय क्रियाएं आपके माइंड को expand करेगा।
Train not, Expand the mind

 



"A human being psychologically is the whole of mankind. He not only represents it but he is the whole of the human species. He is essentially the whole psyche of mankind. On this actuality various cultures have imposed the illusion that each human being is different. In this illusion mankind has been caught for centuries, and this illusion has become a reality. If one observes closely the whole psychological structure of oneself, one will find that as one suffers, so all mankind suffers in various degrees. If you are lonely, the whole humankind knows this loneliness. Agony, jealousy, envy, and fear are known to all. So psychologically, inwardly, one is like another human being. There may be differences physically, biologically. One is tall or short and so on, but basically one is the representative of all mankind.

So psychologically you are the world; you are responsible for the whole of mankind, not for yourself as a separate human being, which is a psychological illusion… If one grasps the full significance of the fact that one is psychologically the world, then responsibility becomes overpowering love."
—Krishnamurti

 




जब शिक्षा केवल किताबों के पन्नों में सिमट जाती है, तो वह दिमाग को भरती है, लेकिन आत्मा को खाली छोड़ देती है। सूचनाओं का बोझ बढ़ता है, पर विचार और संवेदना सिकुड़ने लगते हैं। ऐसे समय में कक्षा केवल एक औपचारिकता बन जाती है—जहाँ उपस्थिति दर्ज होती है, पर जागृति नहीं होती। और यहीं से शुरू होती है एक शिक्षक की असली परीक्षा—वह तय करता है कि वह पाठ्यक्रम का प्रहरी बनेगा या परिवर्तन का प्रणेता।
यही वह बिंदु है जहाँ शिक्षक का रूप साधारण से असाधारण हो जाता है—जहाँ वह अपने भीतर छिपे “हनुमान” को पहचानता है। वह हनुमान, जो अपनी शक्ति से अनजान रहता है, जब तक उसे उसका बोध न कराया जाए। ठीक वैसे ही, एक शिक्षक भी अक्सर अपनी ही भूमिका की विराटता को कम आंकता है। लेकिन जैसे ही उसे अपने प्रभाव, अपनी जिम्मेदारी और अपनी क्षमता का अहसास होता है, वह केवल पढ़ाने वाला नहीं रहता—वह संजीवनी लाने वाला बन जाता है।
समस्याएँ हर युग में रही हैं—संसाधनों की कमी, व्यवस्थागत दबाव, समय की पाबंदियाँ—पर इन सबसे बड़ा संकट तब पैदा होता है जब शिक्षक अपने भीतर के उस हनुमान को सोए रहने देता है। क्योंकि असली बाधा बाहर नहीं, भीतर होती है। जब शिक्षक खुद को सीमित मान लेता है, तभी शिक्षा सीमित हो जाती है।
एक जाग्रत शिक्षक हनुमान की तरह ही कार्य करता है—वह अपने विद्यार्थियों के लिए असंभव को संभव बनाने की जिद रखता है। वह हर बच्चे में संभावनाओं का पर्वत देखता है और खुद वह शक्ति बनता है जो उस पर्वत को उठा सके। वह बच्चों के भीतर आत्मविश्वास की संजीवनी भरता है, उनके भय को दूर करता है, और उन्हें यह विश्वास दिलाता है कि वे केवल अंक लाने के लिए नहीं, बल्कि जीवन गढ़ने के लिए यहाँ हैं।
वह आदेश नहीं देता, प्रेरित करता है। वह डर नहीं पैदा करता, साहस जगाता है। वह केवल उत्तर नहीं देता, प्रश्न करने की आग पैदा करता है। यही वह क्षण होता है जब कक्षा एक कमरा नहीं रहती, वह एक कर्मभूमि बन जाती है—जहाँ शिक्षक और छात्र मिलकर सीखने का एक जीवंत संसार रचते हैं।
आज आवश्यकता इस बात की नहीं है कि हम शिक्षा की कमियों पर विलाप करें, बल्कि इस बात की है कि हम अपने भीतर झाँकें और उस शक्ति को पहचानें, जो हर शिक्षक में निहित है। एक शिक्षक जब अपने “हनुमान स्वरूप” को पहचान लेता है, तो वह किसी नीति, किसी संसाधन, किसी व्यवस्था का मोहताज नहीं रहता। वह स्वयं एक व्यवस्था बन जाता है—एक ऐसी व्यवस्था जो बच्चों के भीतर सोच, साहस और संवेदना का निर्माण करती है।
एक टूटी मेज, एक खाली दीवार, और कुछ जिज्ञासु आँखें—बस इतना ही काफी है, अगर शिक्षक जाग्रत है। क्योंकि असली बदलाव साधनों से नहीं, संकल्प से आता है।
यह समय बहाने गिनाने का नहीं, अपनी शक्ति पहचानने का है। यह समय यह याद करने का है कि हर शिक्षक के भीतर एक हनुमान है—जो यदि जाग जाए, तो वह शिक्षा को केवल एक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक आंदोलन बना सकता है। और जिस दिन यह जागरण होगा, उस दिन कक्षा में केवल पाठ नहीं पढ़ाए जाएंगे, वहाँ जीवन रचा जाएगा।
प्रवीण त्रिवेदी