Sunday, June 14, 2026

 



प्रणाम,
आज का प्रसंग,
ये केचिद्दुःखिता लोके सर्वे ते स्वसुखेच्छया।
ये केचित्सुखिता लोके सर्वे तेऽन्यसुखेच्छया॥ शास्त्रपिटक॥
इस संसारमें जो कोई भी अपने सुखकी इच्छासे कर्म करते हैं, वही दुखी हैं और जो कोई भी दूसरोंके सुखकी इच्छासे कर्म करते हैं, वे ही सुखी हैं।
सर्वे भवन्तु सुखिन, सर्वे संतु निरामया, सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चित दुःखभाग भवेत्। 🙏🙏🙏🙏
आस्था, विश्वास, सत्यनिष्ठ होकर उपरोक्त्त श्लोक भी बारम्बार बोल लें तो सुख अवश्य मिलता है। शब्दों की महिमा अपरंपार है।
करके देखें!
सदी का महासंदेश सत्य से प्रेम, प्रेम से कर्म करें।
प्रसंग प्रणाम से प्रणव तक सत्य की विजय यात्रा में भाग लें।
Look beyond imperfections
Be 'PRASANG' Be Joyous
रेणु वशिष्ठ
मेरी काया मेरी वेधशाला से
4.1.2026

Curiosity makes us wise!!!

 



Only the wise can think! Curiosity makes us wise as it leads to Learning ......
Knowledge economy v/s wisdom economy
Somebody had said we are living in the age of "knowledge economyHe listed five factors -- what he called '4-E's and 1-Q' -- as he laid out his road map for a sustainable society:
Education, Employability, Entrepreneurship, Efficiency and Quality
We at Prasang Vashistha Charitable Trust and Bakhal Preschool curriculum researchers Pvt Ltd say it’s the age of “Wisdom Economy”.
To know all about it join us at the III Symposium: The Teacher as An Awakener
‘Knowledge Economy v/s Wisdom Economy’
August 10, 2024
The general objective here is to tap the hidden potentials of the participants by making them aware of their subtle points to unleash the flow of dormant possibilities so that they can unfold the child’s potentials at three levels, Individual, National and Universal

साक्षरा: शब्द अगर उलटा लिखा तो राक्षसा: हो जाता है

 



साक्षरा: शब्द अगर उलटा लिखा तो राक्षसा: हो जाता है। लेकिन सरस: शब्द अगर उलटा लिखा तो भी सरस: ही रहता है । साक्षर या शिक्षित व्यक्ति भी तनाव में कुछ स्थितियों में एक राक्षस की तरह व्यवहार कर सकते हैं। लेकिन एक सज्जन (चाहे शिक्षित या अशिक्षित), किसी भी हालत में अपने अच्छे गुण नहीं छोड़ता हैं । इसीलिए सिर्फ साक्षर नहीं, सज्जन भी बनना चाहिए।
If (the word) "SakShara" (literate) is inverted, it becomes "RakShasa" (devil). (but) if (the word) "sarasa" (good) is inverted, it remains "sarasa". A "sakshara" (literate or educated person) can behave like a "rakshas" (a wicked person) in certain situations under stress if he is not able to control himself. But a "saras" (good person, cultured person, gentleman) whether educated or uneducated, will not leave his this property (of being good person) in any condition. Thus, it is advisable for us to be a sarasa person along with being SakShara.

दिव्यास्त्र तो बन रहे है परंतु बच्चों की दिव्यता का पोषण नहीं हो रहा?

 



शिव कृपा करो
शिव आज्ञा दो
श्रीवाग्नि प्रवाहित होने।
प्रणाम,
दिव्यास्त्र तो बन रहे है परंतु बच्चों की दिव्यता का पोषण नहीं हो रहा?
दिव्यता के पोषण हेतु शिक्षा नहीं विद्या देनी चाहिए। बच्चों को साक्षर नहीं सरस बनाना है।
ज्ञान का विज्ञान जाने बिना बच्चों की दिव्यता उजागर नहीं हो सकती। दिव्यता बुद्धि में नहीं विवेक के केंद्र बिंदु में होती है। सुनने, बोलने, लिखने, पढ़ने में बिंदु को प्रकाशित होना चाहिए।
बिंदु के केंद्र में पहुंचने के लिए केंद्रित होने की आवश्यकता है।
अनुशासन के बिना केंद्रित होना संभव नहीं। अनुशासन का अर्थ ही अपने अणु अणु पर शासन करना है। यदि बच्चे अपने केंद्र को नहीं थाम पाए तो उनकी दिव्यता व्यर्थ व्यय हो जाती है।
दिव्य होने के लिए सदी के महासंदेश सत्य से प्रेम, प्रेम से कर्म करें।
प्रसंग प्रणाम से प्रणव तक सत्य की विजय यात्रा में भाग लें।
Look beyond imperfections
Be 'PRASANG' Be Joyous
रेणु वशिष्ठ
मेरी काया मेरी वेधशाला से
9फरवरी 2026

Saturday, June 13, 2026

 



आदि श्रीशंकराचार्य जी के पिता श्रीशिवगुरु ग्राम में ही विद्यमान कात्यायनी देवी का नित्य पूजन करते थे।
स्वादिष्ट गोदुग्ध का भोग लगाने के अनन्तर अवशिष्ट दुग्ध पुत्र को देते थे, देवी का प्रसाद समझकर बालक ग्रहण करता था ।
एक दिन पिता को किसी आवश्यक कार्य से कुछ दिनों के लिए बाहर जाना पड़ा । उन्होंने पत्नी को पूजन तथा दुग्ध भोग लगाने की आज्ञा दी । माता जी अवशिष्ट प्रसाद बालक को देती थी । बीच में वह मासिक धर्म से युक्त हुई, तब बालक को बुलाकर भगवती का पूजन करने के लिए दुग्ध दिया ।
बालक ने देवी के मंदिर में जाकर भक्तिपूर्वक देवी को स्नान करवाकर माता द्वारा दिया हुआ दुग्ध जगदम्बा के आगे रखकर पीने की प्रार्थना की ।
दुग्ध को ज्यूँ का त्यूँ देखकर, 'अम्बा कुपित हो गई हैं इसीलिए ग्रहण नहीं करती' यह सोचकर बाल भाव से आचार्य रुदन करने लगे । इनके आगे पार्वती जी प्रकट हुई और स्वर्ण पात्रस्थ दुग्ध लेकर पीने लगी ।
पात्र को पूरा खाली होते हुए देखकर उन्होंने कहा-- "हे अम्ब ! क्या सब पी जाओगी ?, हमे नहीं दोगी ?" हठ करते हुए अब और रुदन करने लगे । तब बाल-वत्सला जगदम्बा ने बालक को गोद में लेकर दुलार करती हुई अपना स्तनपान कराने लगी । उस दुग्ध में ज्ञान, वैराग्य तथा काव्य धारा भरी थी । यह आचार्य की कुलदेवी थी ।
जगदम्बा के दाहिने स्तन से ज्ञान और वैराग्य की धारा तथा बाएं स्तन से काव्य धारा प्रवाहित हुई । इसी भाव को व्यक्त करते हुए आचार्यपाद ने "सौंदर्य लहरी" के ९७वें श्लोक में कहा है । इस ग्रँथ पर सौभाग्यवर्धिनी, अरुणामोदिनी,आनंदगिरीय तथा भास्कर राय की व्याख्याएं है ।~~
"हे अम्ब ! आपका यह द्रविड़ शिशु आपके स्तनपान के प्रभाव से ही ज्ञान-वैराग्य को प्राप्त करके काव्य रचना करने में सक्षम हुआ है ।"
भगवती के प्रकट होने पर भक्तिपूर्वक स्तुति करके पूजा समाप्त की । देवी मंदिर से निकलकर आचार्य अपनी माता के साथ घर पहुंचे । कुछ दिनों बाद पिता जब लौटकर आये तब बालक का तेज देखकर अति विस्मय को प्राप्त हुए ।
भगवती ने आकाशवाणी द्वारा कहा-- "आपका यह पुत्र साधारण बालक नहीं है, बल्कि स्वामी कार्तिक ही तुम्हारे पुत्ररूप में है, इसमें संदेह नहीं है । अथवा विष्णु ने ही बालक रूप धारण किया है या सत्यवती नंदन भगवान व्यास ही इस बालक के रूप में विद्यमान है ।" इस प्रकार देवी ने प्रशंसा की।

 



शिव कृपा करो,

शिव आज्ञा दो,
शिवाग्नि प्रवाहित हो,
प्रणाम ॐ
स्कूलों में शिक्षा दी जाती है, विद्या तो माता पिता ही अपने सत्कर्म से दे सकते हैं।
वाहन बनाना, चलाना,हवाई जहाज बनाना, उड़ाना सब कुछ विद्यालयों, विश्वविद्यालयों में सिखाया जा रहा है परंतु जीवन गाड़ी को चलाने वाली आत्मा को पोषित करने के लिए माता पिता ही प्रथम शिक्षक/गुरु हैं और परिवार पहली पाठशाला।
प्रश्न उठता है, आजकल के बच्चे सुनते नहीं?
सही बात है, इस सही बात को सही कैसे किया जाए?
सदी का महासंदेश यही कहता है सत्य से प्रेम, प्रेम से कर्म करें।
प्रसंग प्रणाम से प्रणव तक सत्य की विजय यात्रा में भाग लें।
Look beyond imperfections
Be 'PRASANG' Be Joyous
रेणु वशिष्ठ
मेरी काया मेरी वेधशाला से
Prasang Vashistha Charitable Trust एवं Bakhal Pre School Curriculum Researchers Pvt. Ltd. कटिबद्ध है चरित्र निर्माण से राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान देने हेतु।
आप भी सहयात्री बने।

 विद्वत्वं दक्षता शीलं सङ्क्रान्तिरनुशीलनम् ।

शिक्षकस्य गुणाः सप्त सचेतस्त्वं प्रसन्नता ।
शक्षक के सप्त गुण होते हैँ । यह है – विद्वता (knowledge), शिष्य के ग्रहणशक्ति के अनुसार शिक्षा देने के दक्षता (teaching skill), उत्तम चरित्र (integrity), अपने मन के भाव (विचार) को शिष्य के मन में प्रवेश कराने की योग्यता (communication skill), सब विषय में सचेतनता (carefulness), तथा प्रसन्नता (pleasant personality)