इन्द्रियों से आत्मतत्त्व तक एक दार्शनिक अभिलेख
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः॥ — श्रीमद्भगवद्गीता 3.42।
यह श्लोक मनुष्य की आन्तरिक सत्ता, उसकी अनुभव-प्रक्रिया, मानसिक प्रवृत्तियों, विवेकशक्ति और आत्मतत्त्व के पारस्परिक सम्बन्ध को उद्घाटित करने वाला एक महत्त्वपूर्ण दार्शनिक सूत्र है। मनुष्य संसार को आँखों से देखता है, कानों से सुनता है, त्वचा से स्पर्श अनुभव करता है, जिह्वा से रस ग्रहण करता है और नासिका से गन्ध पहचानता है, किन्तु उसका जीवन केवल इन्द्रियों द्वारा प्राप्त अनुभवों से संचालित नहीं होता। एक ही दृश्य देखकर दो व्यक्तियों के विचार अलग हो सकते हैं, एक ही परिस्थिति में कोई व्यक्ति संयम रख सकता है, जबकि दूसरा आवेश में निर्णय कर बैठता है। इसका कारण यह है कि इन्द्रियानुभव, मानसिक प्रतिक्रिया, बुद्धि का निर्णय और आत्मतत्त्व एक ही स्तर की वस्तुएँ नहीं हैं। इन्द्रियाँ बाह्य विषयों को ग्रहण करती हैं, मन उन विषयों के प्रति आकर्षण, अरुचि, स्मृति, कल्पना और भावनात्मक प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है, बुद्धि उन अनुभवों तथा प्रतिक्रियाओं का परीक्षण करके उचित-अनुचित का निर्णय करती है और वेदान्त आत्मतत्त्व को शरीर, इन्द्रियों, मन तथा बुद्धि से भिन्न, उनके अनुभवों का साक्षी मानकर उसका अन्वेषण करता है। यहाँ ‘पर’ शब्द का अर्थ केवल ऊपर या आगे नहीं, बल्कि अधिक सूक्ष्म, अधिक आन्तरिक अथवा नियामक स्तर से है। श्लोक का अन्वय है—इन्द्रियाणि पराणि आहुः, इन्द्रियेभ्यः मनः परम्, मनसः तु बुद्धिः परा, यः बुद्धेः परतः तु सः। अर्थात् इन्द्रियों को शरीर से श्रेष्ठ कहा गया है, इन्द्रियों से मन श्रेष्ठ है, मन से बुद्धि श्रेष्ठ है और जो बुद्धि से भी परे है, वह आत्मतत्त्व है। इस क्रम का उद्देश्य मनुष्य को अपनी आन्तरिक शक्तियों का बोध कराना और उन्हें विवेकपूर्ण दिशा में संचालित करने की प्रेरणा देना है। इन्द्रियाँ संसार से सम्पर्क के द्वार हैं, परन्तु इन्द्रियानुभव अपने-आप में सम्पूर्ण सत्य नहीं है। आँख दृश्य दिखाती है, लेकिन दृश्य का सम्पूर्ण कारण नहीं बताती; कान शब्द सुनता है, लेकिन वक्ता का वास्तविक अभिप्राय अपने-आप नहीं जानता। किसी व्यक्ति का बाहरी व्यवहार दिखाई दे सकता है, पर उसके भीतर का उद्देश्य केवल दृश्य से निश्चित नहीं किया जा सकता। इसलिए इन्द्रियानुभव आवश्यक है, किन्तु उसकी समुचित व्याख्या के लिए मन और बुद्धि की आवश्यकता होती है। इन्द्रियों का संयम उनके निषेध का नाम नहीं है; देखना, सुनना, बोलना और कर्म करना जीवन के स्वाभाविक साधन हैं। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब इन्द्रियाँ विवेक के अधीन रहने के स्थान पर मनुष्य के निर्णयों पर एकाधिकार कर लेती हैं। भगवद्गीता कहती है—तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः। वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥ (गीता 2.61)। अर्थात् इन्द्रियों को संयमित करके परम लक्ष्य में स्थित रहना चाहिए; जिसकी इन्द्रियाँ वश में हैं, उसकी प्रज्ञा स्थिर होती है। इसका आशय संसार से आँखें फेर लेना नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए अपनी बुद्धि और विवेक को सुरक्षित रखना है। श्लोक का दूसरा चरण है—इन्द्रियेभ्यः परं मनः। इन्द्रियों से मन श्रेष्ठ है, क्योंकि इन्द्रियाँ विषयों को ग्रहण करती हैं, जबकि मन उन विषयों के प्रति आकर्षण, अरुचि, स्मृति, कल्पना और भावनात्मक प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है। एक व्यक्ति के सामने स्वादिष्ट भोजन रखा है; जिह्वा रस का अनुभव करती है, पर मन उसमें आसक्त हो सकता है। दूसरा व्यक्ति उसी भोजन को देखकर अपनी आवश्यकता, स्वास्थ्य, समय और कर्तव्य पर विचार कर सकता है। बाहरी विषय एक ही है, किन्तु मानसिक प्रतिक्रिया अलग-अलग है। मन केवल वर्तमान इन्द्रियानुभव से प्रभावित नहीं होता; वह स्मृतियों को पुनः सामने लाता है, भविष्य की कल्पना करता है और अनुपस्थित विषयों के प्रति भी इच्छा उत्पन्न करता है। इसीलिए मनुष्य कभी-कभी उस वस्तु के पीछे भी दौड़ता है, जो उसके सामने उपस्थित नहीं है। भगवद्गीता इस प्रक्रिया को स्पष्ट करती है—ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते। सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥ (गीता 2.62)। अर्थात् विषयों का बार-बार चिन्तन करने से उनमें आसक्ति उत्पन्न होती है, आसक्ति से कामना और कामना में विघ्न पड़ने पर क्रोध उत्पन्न होता है। किसी विषय को देख लेना और उसके बारे में बार-बार सोचते रहना एक बात नहीं है। इन्द्रियानुभव क्षणिक हो सकता है, लेकिन मन का पुनरावृत्त चिन्तन उसे इच्छा और आसक्ति में बदल सकता है। इसलिए साधना केवल बाहरी विषयों से दूरी बनाने का नाम नहीं, बल्कि अपने मन की गति को पहचानने और उसे उचित दिशा देने की कला भी है। इन्द्रिय विषय को सामने लाती है, मन उसे भीतर स्थान देता है। श्लोक का तीसरा चरण है—मनसस्तु परा बुद्धिः। मन से बुद्धि श्रेष्ठ है, क्योंकि मन संकल्प-विकल्प, विचारों की गति तथा मानसिक प्रतिक्रियाओं से सम्बन्धित है, जबकि बुद्धि परीक्षण, निश्चय, भेदबोध और निर्णय की शक्ति है। मन कह सकता है कि मुझे यह वस्तु चाहिए, लेकिन बुद्धि पूछ सकती है कि क्या यह वस्तु मेरे लिए उचित है। मन कह सकता है कि मैं अभी क्रोध में उत्तर दूँगा, लेकिन बुद्धि विचार कर सकती है कि मेरा उत्तर परिस्थिति को सुधारेगा या बिगाड़ेगा। मन किसी लाभ की ओर आकर्षित हो सकता है, जबकि बुद्धि उस लाभ के साधन, परिणाम, नैतिकता और दीर्घकालीन प्रभाव का परीक्षण कर सकती है। बुद्धि का कार्य केवल अधिक विचार करना नहीं, बल्कि विचारों के बीच उचित निर्णय करना है। यदि बुद्धि केवल स्वार्थ को अधिक कुशलता से पूरा करने लगे, तो वह धर्ममय विवेक नहीं कहलाएगी। धर्ममय बुद्धि को यह भी देखना होता है कि निर्णय सत्य, न्याय, कर्तव्य और लोकहित के अनुकूल है या नहीं। भगवद्गीता का निर्देश है—उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥ (गीता 6.5)। मनुष्य अपने द्वारा अपना उत्थान करे, अपने को अधोगति में न डाले, क्योंकि मनुष्य स्वयं अपना मित्र भी है और स्वयं अपना शत्रु भी। इसका आशय है कि मनुष्य अपनी मानसिक प्रवृत्तियों को पहचानकर, बुद्धि का परिष्कार करके और उचित कर्म का अभ्यास करके अपने जीवन की दिशा बदल सकता है। श्लोक का सर्वाधिक गहन अंश है—यो बुद्धेः परतस्तु सः। जो बुद्धि से भी परे है, वह आत्मतत्त्व है। बुद्धि अनुभवों, स्मृतियों, धारणाओं और तर्कों के माध्यम से कार्य करती है; वह किसी वस्तु का परीक्षण करती है, निष्कर्ष पर पहुँचती है और परिस्थितियों के अनुसार अपने निष्कर्ष को बदल भी सकती है। वेदान्त आत्मा को शरीर, इन्द्रियों, मन और बुद्धि से भिन्न जानने का प्रयास करता है। विचारों को जानना और विचार होना एक ही बात नहीं है; किसी निर्णय पर पहुँचना और उस निर्णय को जान पाना भी अलग-अलग स्तर हैं। जब मनुष्य कहता है कि मेरे मन में क्रोध उठ रहा है, तब वह क्रोध को अपने अनुभव का विषय बना रहा होता है। जब वह कहता है कि मेरी बुद्धि इस निर्णय को उचित मान रही है, तब वह बुद्धि के निर्णय पर भी विचार कर सकता है। यह आत्मनिरीक्षण मनुष्य को अपनी प्रत्येक मानसिक अवस्था के साथ अन्धी पहचान बना लेने से बचाता है। फिर भी आत्मा को साक्षी मानने का अर्थ यह नहीं कि मनुष्य अपने व्यवहार की जिम्मेदारी से मुक्त हो जाए। यह कहना कि मैं साक्षी हूँ, इसलिए मेरे कर्मों का मुझसे कोई सम्बन्ध नहीं, गीता के कर्मयोग का आशय नहीं है। आत्मबोध का उद्देश्य कर्तव्य से पलायन नहीं, बल्कि आसक्ति, अहंकार और अविवेक से मुक्त होकर उचित कर्म करना है। भगवद्गीता कहती है—तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर। असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः॥ (गीता 3.19)। अर्थात् आसक्ति से रहित होकर कर्तव्य कर्म करो; आसक्तिरहित कर्म करते हुए मनुष्य परम पद को प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार आत्मतत्त्व का बोध कर्म का निषेध नहीं करता, बल्कि कर्म के पीछे स्थित आसक्ति और अहंकार का परीक्षण करने की प्रेरणा देता है। गीता के इस सूत्र की पूरक व्याख्या कठोपनिषद् के रथरूपक में प्राप्त होती है—आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु। बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च॥ (कठोपनिषद् 1.3.3)। अर्थात् आत्मा को रथ का स्वामी, शरीर को रथ, बुद्धि को सारथि और मन को लगाम समझो। आगे उपनिषद् कहता है—इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान्॥ (कठोपनिषद् 1.3.4)। इन्द्रियों को घोड़े और विषयों को उनके विचरण के मार्ग कहा गया है। इस रूपक में शरीर साधन है, इन्द्रियाँ गति और अनुभव के माध्यम हैं, मन लगाम है तथा बुद्धि सारथि है। यदि लगाम अस्थिर है और सारथि विवेकहीन है, तो रथ उचित दिशा में नहीं चलेगा; किन्तु जब बुद्धि जागरूक है और मन संयमित है, तब इन्द्रियों की शक्ति उद्देश्यपूर्ण दिशा में प्रयुक्त हो सकती है। इसका अर्थ यह नहीं कि शरीर या इन्द्रियाँ शत्रु हैं। घोड़े न हों तो रथ आगे नहीं बढ़ेगा, किन्तु उन्हें दिशा देने वाला सारथि भी आवश्यक है। शक्ति का होना पर्याप्त नहीं, शक्ति का विवेकपूर्ण संचालन आवश्यक है। यही बात आधुनिक जीवन में भी लागू होती है। ज्ञान, तकनीक, धन, पद और प्रभाव सभी शक्तियाँ हैं। यदि इनके संचालन में विवेक और उत्तरदायित्व न हो, तो वही शक्ति विनाश का कारण बन सकती है; यदि ये धर्म और लोकहित के अधीन हों, तो आत्मोन्नति के साथ समाज का कल्याण भी सम्भव होता है। साधना का उद्देश्य इन्द्रियों को दबाना और विचारों को बलपूर्वक समाप्त कर देना नहीं, बल्कि अपनी आन्तरिक शक्तियों को पहचानना, उनके पारस्परिक सम्बन्ध को समझना और उन्हें उचित दिशा देना है। इन्द्रियों का अनुशासन आवश्यक है, ताकि वे मन को निरन्तर विषयों की ओर खींचकर विवेक को दुर्बल न करें। मन का परिष्कार आवश्यक है, ताकि स्मृति, कल्पना, इच्छा और भावनाएँ निर्णय पर अनुचित अधिकार न जमा लें। बुद्धि का परिष्कार आवश्यक है, ताकि वह केवल स्वार्थ का समर्थन न करे, बल्कि सत्य, न्याय और धर्म का परीक्षण कर सके। आत्मतत्त्व की खोज मनुष्य को यह देखने में सहायता करती है कि उसकी प्रत्येक इच्छा ही उसका वास्तविक स्वरूप नहीं है, प्रत्येक विचार अन्तिम सत्य नहीं है और प्रत्येक मानसिक प्रतिक्रिया के अनुसार कार्य करना अनिवार्य नहीं है। यही आत्मसंयम का व्यावहारिक रूप है—इच्छा को पहचानना, उसके परिणाम को समझना, उचित-अनुचित का विवेक करना और फिर उत्तरदायित्वपूर्वक कर्म करना। पतञ्जलि योगसूत्र का सूत्र स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमिः॥ (योगसूत्र 1.14) इसी निरन्तर अभ्यास की आवश्यकता को स्पष्ट करता है। अभ्यास दीर्घकाल तक, बिना व्यवधान और श्रद्धापूर्वक किया जाए, तभी वह दृढ़ भूमि प्राप्त करता है। इसलिए आत्मसंयम किसी एक दिन का संकल्प नहीं, बल्कि बार-बार अपने मन की गति को पहचानने, बुद्धि को जागरूक रखने और उचित आचरण का अभ्यास करने की प्रक्रिया है। आत्मबोध की चर्चा कभी-कभी इस प्रकार की जाती है मानो उसका संसार और समाज से कोई सम्बन्ध न हो, परन्तु गीता के कर्मयोग में आत्मविकास और उत्तरदायी कर्म परस्पर विरोधी नहीं हैं। जो व्यक्ति अपनी इच्छाओं का परीक्षण करना सीखता है, वह दूसरों की इच्छाओं और अधिकारों का भी अधिक न्यायपूर्ण विचार कर सकता है। जो अपने क्रोध को पहचानता है, वह क्रोध के अधीन होकर निर्णय लेने से बच सकता है। जो लाभ के प्रति आसक्ति को समझता है, वह लाभ के लिए अनुचित साधन अपनाने से स्वयं को रोक सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि आत्मचिन्तन करने वाला प्रत्येक व्यक्ति स्वतः पूर्ण ज्ञानी हो जाता है; आत्मबोध का दावा और वास्तविक आचरण अलग बातें हैं। ज्ञान की सार्थकता उसके व्यवहार, उत्तरदायित्व, सत्यनिष्ठा और करुणा में भी परखी जानी चाहिए। यहाँ यह सूत्र पुनः सार्थक होता है—शब्द से तत्त्व, तत्त्व से बोध, बोध से विवेक और विवेक से आचरण। केवल श्लोक याद कर लेना ज्ञान की सम्पूर्णता नहीं; उसके आशय को समझना बोध है, उस बोध के आधार पर उचित-अनुचित का निर्णय करना विवेक है और उस निर्णय को जीवन में उतारना आचरण है। इसी प्रकार ऋषि से स्मृति, स्मृति से संस्कार, संस्कार से विवेक, विवेक से पुरुषार्थ, पुरुषार्थ से आत्मोन्नति और आत्मोन्नति से लोकहित की यात्रा उस जीवन-दृष्टि को व्यक्त करती है जिसमें परम्परा का अध्ययन अन्धस्वीकार नहीं बनता, संस्कार जड़ता नहीं बनते और आत्मोन्नति पलायन नहीं बनती, बल्कि ये सब मिलकर विवेकपूर्ण, उत्तरदायी और लोककल्याणकारी जीवन की तैयारी करते हैं। अन्ततः गीता 3.42 का मूल प्रश्न केवल यह नहीं है कि इन्द्रियों से मन श्रेष्ठ है, मन से बुद्धि श्रेष्ठ है और बुद्धि से आत्मा परे है; इसका साधनात्मक प्रश्न यह है कि मनुष्य अपनी जीवन-यात्रा में किस स्तर से संचालित हो रहा है। यदि वह केवल इन्द्रियाकर्षण से संचालित है, तो तत्काल सुख उसका निर्णय कर सकता है। यदि वह मन की इच्छाओं और आवेगों से संचालित है, तो उसकी दिशा बार-बार बदल सकती है। यदि वह बुद्धि का उपयोग करता है, तो वह परिणामों का परीक्षण कर सकता है। और यदि वह आत्मतत्त्व के बोध की दिशा में साधना करता है, तो वह अपनी मानसिक अवस्थाओं को ही अपना सम्पूर्ण स्वरूप मान लेने से मुक्त होने का प्रयास कर सकता है। यहाँ बुद्धि को नष्ट करना नहीं, उसे परिष्कृत करना है; मन को शत्रु मानना नहीं, उसे अनुशासित करना है; इन्द्रियों को काट देना नहीं, उन्हें विवेक के अधीन रखना है। आत्मबोध की साधना इन सबको उनके उचित स्थान पर स्थापित करने का प्रयत्न है। इस दृष्टि से दशरथ से राम तक की प्रतीकात्मक यात्रा बाहरी कथा से आगे बढ़कर आत्मनिरीक्षण का माध्यम बन सकती है—देह और इन्द्रियों से आरम्भ होकर मन की प्रवृत्तियों का परीक्षण, बुद्धि का परिष्कार, धर्ममय विवेक का उदय और कर्तव्यपूर्ण आचरण तक। अन्ततः इन्द्रियाँ अनुभव के द्वार हैं, मन अनुभवों की प्रतिक्रिया का क्षेत्र है, बुद्धि निर्णय की शक्ति है और आत्मतत्त्व उस समूची व्यवस्था से परे खोजा जाने वाला आध्यात्मिक सत्य है। जब इन्द्रियाँ संयमित हों, मन परिष्कृत हो, बुद्धि विवेकशील हो और कर्म धर्म के अनुरूप हो, तब मनुष्य की शक्तियाँ परस्पर संघर्ष करने के स्थान पर एक-दूसरे की सहायक बनती हैं। यही आत्मसंयम से आत्मबोध और आत्मबोध से लोकहित की ओर बढ़ने वाली साधना का व्यावहारिक संकेत है। सत्यं मार्गदर्शकं, विवेकः निर्देशकः, पुरुषार्थः साधनम्, आत्मोन्नतिः लक्ष्यं, लोकहितं च जीवनस्य विस्तारः।
जय श्री राधे कृष्णा

I have copied and pasted it so I can refer it again and again to deepen my knowledge.