Wednesday, November 4, 2026

बचपन की पाठशाला: जहाँ कहानियों से गढ़, और संस्कारों से नींव मिलती है

 


बचपन की पाठशाला: जहाँ कहानियों से गढ़, और संस्कारों से नींव मिलती है

बचपन की वास्तविक प्रयोगशाला कोई चार दीवारों वाला कमरा नहीं, बल्कि वह आत्मीय आंचल है जहाँ अनौपचारिक संवाद, पारंपरिक लोक-कथाएँ और बड़ों का सान्निध्य मिलकर बच्चों के मन को सींचते हैं।

आज के इस अति-डिजिटल युग में, जहाँ हर चीज़ स्क्रीन पर सिमटती जा रही है, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बाल मन को कोमलता, स्थिरता और मानवीय संवेदनाओं की जो गहराई अपनों के बीच बैठकर मिलती है, उसका कोई विकल्प नहीं हो सकता।

आइए, हम सब मिलकर बच्चों को कोरी जानकारियों के बोझ से मुक्त करें और उन्हें उस पारंपरिक व स्पर्शमय परिवेश से जोड़ें—जहाँ हर एक कहानी जीवन का पाठ बनती है और हर एक सीख चरित्र की नींव रखती है।

क्योंकि बच्चों का भविष्य केवल आधुनिक उपकरणों की गति पर नहीं, बल्कि हमारे संस्कारों की जड़ों की गहराई पर निर्भर करता है।

The Classroom of Childhood: Where Stories Shape the Foundation and Values Build Character

The true laboratory of childhood is not a room with four walls, but that warm embrace where informal conversations, traditional folklore, and the presence of elders together nurture a child's mind.

In today's hyper-digital age, where everything is shrinking onto screens, we must not forget that the depth of tenderness, stability, and human sensitivity that children gain by sitting together with loved ones has no substitute.

Let us come together to free children from the burden of raw information and reconnect them with that traditional, tactile environment—where every story becomes a life lesson and every learning session lays the foundation of character.

Because a child's future depends not on the speed of modern devices, but on the depth of our rooted values.

#EarlyChildhoodEducation #ChildDevelopment #TraditionalWisdom #HolisticLearning #PreschoolCurriculum #IndianHeritage #ParentingJourney #BakhalResearch #MindfulParenting #EducationReform

 


Tuesday, November 3, 2026

बढ़ विजय की ओर!!!

 




बढ़ विजय की ओर
भय समग्र तजकर
साहस सकल बटोरकर
बढ़ विजय की ओर।
धीर हो गंभीर हो,
दृढ़ प्रतिज्ञ, निष्ठावान हो,
साहस सकल बटोरकर,
भय समग्र परित्याग कर,
बढ़ विजय की ओर।
शांत हो, मौन हो,
धैर्यवान, आत्मनिष्ठ हो
साहस सकल बटोरकर
संशय संपूर्ण अवध्वंस कर
बढ़ विजय की ओर।
संघर्ष से हर्षित हो
हर्ष में निश्चल हो,
साहस सकल बटोरकर
संत्रास का संहारकर
बढ़ विजय की ओर।
स्थिरचित हो, संकेंद्रित हो,
एकाग्रचित, एकनिष्ठ हो,
साहस सकल बटोरकर
विभीषिका अखिल विध्वंसकर,
बढ़ विजय की ओर!
बढ़ विजय की ओर!!
बढ़ विजय की ओर!!!
रेणु वशिष्ठ

आज का प्रसंग, सभी स्कूल्स बच्चे के पूर्ण विकास की बात करते हैं।

 



प्रणाम,
आज का प्रसंग,
सभी स्कूल्स बच्चे के पूर्ण विकास की बात करते हैं। माता पिता भी यही चाहते हैं । बच्चे को पूर्ण चंद्र बनाना, सोलह कलाओं में निपुण। और बच्चे की क्षमताओं को जाने बिना ही उस पर ना जाने कितने प्रकार की हॉबी क्लासेज का, पढ़ाई के अलावा, बोझ डाले रहते हैं। खेल भी खेले, तो नृत्य भी सीखे, पेंटिंग भी सीखे, वाद्य यंत्र भी बजा ले तो जूडो कराटे भी कर ले, फिर ट्यूशन भी जाए।
सप्ताह में एक दो दिन के लिए किसी न किसी कक्षा के लिए प्रतिदिन जाना।
थोड़ा समझना चाहिए कोई भी, कोई भी इंसान सोलह कलाओं में निपुण हो पूर्ण चंद्र नही हो सकता, शरीर की क्षमता ही नही। और फिर उस पर व्यक्तिगत भिन्नताएं शारीरिक, मानसिक , सामाजिक आदि आदि।
हम नया चांद हों या अर्ध चंद्र हों कोई फर्क नहीं पड़ता , सुंदर ही लगते हैं जब शीतलता देते हैं।
आठ कलाओं को अर्थात अर्धचंद्र सी कलाओं का विकास करने की पात्रता ही है इंसान में। हां यदि आठ को विकसित कर लिया जाए तो आठ गुना आठ चौंसठ प्रकार के योग बनने की संभावना रहती है। और आप पूर्ण चंद्र सा शीतल प्रकाश दे सकते हैं। सोलह कलाओं को फिर भी नही।
आगे का प्रसंग फिर कभी उद्भूत होगा। आज इतना ही डाउनलोड हुआ है। समझे सभी अपनी अपनी क्षमताओं अनुसार कलाएं डाउनलोड ही कर रहे हैं, जैसे जैसे पात्रता बढ़ती है डाउन लोड होता जाता है।
बच्चे की पात्रता बढ़ाने के लिए क्या करें। सबसे पहले यम नियम पर चलना सिखाएं उसके बाद आसन (आसन से मेरा मतलब योगासन नहीं) अर्थात उठने बैठने के तौर तरीके। संस्कार दें। उसे Positive, Responsible, Ambitious, Supportive, Abreast, Noble, Generous होने के मूल्य दें।
अपने फिक्स्ड माइंडसेट में अपने बच्चों को फिक्स ना करें, उसे ग्रोथ माइंडसेट दें तो काल चक्र स्वयं उसको उसकी विशिष्ट योग्यताओं की पूर्णता तक ले जाने में मदद करेगा।
विचार व्यक्तिगत हैं। किसी प्रकार के तर्क वितर्क के लिए बाध्य नहीं हैं।
Look beyond imperfections
Be 'PRASANG' Be Joyous
प्रसंग प्रणाम से प्रणव तक सत्य की विजय यात्रा में भाग लें।
रेणु वशिष्ठ
मेरी काया मेरी वेधशाला से
शनिवार 3.8.2024

आओ साथ मिलके चले

 




साथ मिलकर कदमों का सफर: हौसलों की उड़ान

यह बात 19 अगस्त 2006 की है। 'आनंदपुर' नाम के एक खूबसूरत और हरे-भरे गाँव में कुछ नन्हें दोस्त रहते थे। उस दिन गाँव के बच्चों ने मिलकर एक लंबी और रोमांचक ट्रैकिंग पर जाने का फैसला किया।

रास्ता लंबा और अनजान था, इसलिए कुछ बच्चे मन ही मन थोड़े डरे हुए थे। तभी उनमें से एक समझदार बच्चे ने प्यार से सबका हौसला बढ़ाया और गुनगुनाया—

"आओ साथ मिलके चले इन हसीन राहों में..."

बस, फिर क्या था! सब बच्चों ने एक-दूसरे का हाथ थाम लिया। जब वे सब साथ चले, तो रास्ते की बड़ी-बड़ी मुश्किलें भी अपने आप कम होने लगीं। हर एक कदम के साथ उनका आत्मविश्वास और भाईचारा मजबूत होता चला गया।

चलते-चलते अचानक रास्ते में झाड़ियों के बीच से एक खतरनाक रुकावट आई—एक तरफ से हवा का तेज झोंका और कंकड़-पत्थरों के बीच एक बड़ी बाधा ने उन्हें डराने की कोशिश की। लेकिन बच्चों के मन में पक्का इरादा था कि वे हर मुश्किल का डटकर सामना करेंगे। उन्होंने तय किया कि जो भी डर या बाधा उन्हें डराएगी, वे अपने मजबूत हौसलों से उसका डटकर मुकाबला करेंगे और हर बाधा को दूर भगा देंगे।

सबने मिलकर एक-दूसरे का हाथ मजबूती से पकड़ा और कदम-दर-कदम आगे बढ़ते गए। उस दिन बच्चों ने यह सीख लिया कि जब इरादे पक्के हों और अपनों का साथ हो, तो दुनिया की कोई भी ताकत आपको आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती!

आओ साथ मिलके चले
इन हसीन राहों में......
मुश्किलें राहों की कम हों
जब चलें हम साथ में
हाथ में हो हाथ और
कदम कदम हो साथ में
हाथ में हो हाथ
कदम कदम हो साथ
मुश्किलें राहों की कम हो
फन कुचल देंगे हम उसका
जो हमें फुंफकारता
बाधाओं को दूर कर
हम चल पड़ेगें साथ में
हाथ में हाथ
19.8.2006

कदम से कदम को मिला के चलो

 




कदम से कदम को मिला के चलो
सभी को गले से लगा के चलो
हर इक कदम अपनी चा हत बने
कदम दर कदम मिलके ताकत बने
कदम दर कदम हम तो आगे बढ़े।


कदमों का जादुई सफर और एकता की ताकत

एक सुंदर और हरे-भरे गाँव में 'मधुबन' नाम का एक प्यारा सा स्कूल था। वहाँ कई सारे नन्हे-मुन्ने बच्चे पढ़ते थे। उन बच्चों में एक बात बहुत खास थी—वे कभी अकेले नहीं चलते थे। वे हमेशा एक-दूसरे का हाथ थामकर, "कदम से कदम को मिला के चलो" गाते हुए स्कूल आते और खेलते थे।

एक दिन स्कूल के खेल के मैदान में एक मजेदार प्रतियोगिता हुई। टीचर ने बच्चों से कहा, "आज तुम सबको मिलकर एक लंबी छलांग लगानी है और मैदान के दूसरे छोर तक पहुँचना है।"

शुरुआत में सब बच्चे अलग-अलग भागने लगे, जिससे वे बार-बार लड़खड़ा कर गिर जाते। तब एक समझदार बच्ची आगे आई और बोली, "ऐसे अकेले भागने से हम थक जाएँगे और जीत नहीं पाएंगे। हमें तो मिलकर चलना होगा!"

फिर क्या था! सब बच्चों ने एक-दूसरे के कंधे पर हाथ रखा, सभी को गले से लगा के चलो की तर्ज पर आपस में प्यार से जुड़े और एक साथ लाइन बनाई।

अब हर एक कदम उनकी चाहत बन गया था। जब वे सब एक साथ तालमेल बिठाकर आगे बढ़ने लगे, तो वह कदम-दर-कदम मिलकर एक बहुत बड़ी ताकत बन गया। किसी को भी अब अकेलेपन या हार का डर नहीं था, क्योंकि वे सब एक साथ, कदम दर कदम आगे बढ़ रहे थे।

उन्होंने हँसते-गाते हुए वह खेल भी जीत लिया और यह सीख लिया कि जब हम सब मिलकर, एक-दूसरे का साथ देते हुए आगे बढ़ते हैं, तो कोई भी मुश्किल बड़ी नहीं होती!




चंदा के चाक पे

 






चंदा के चाक पे
इक दुनिया बनाएंगे,
बच्चों चलो! चलो!चलो!
जल्दी चलो,
धरती की माटी
गगन में ले जाएंगे
बादल का थोड़ा सा पानी मिलाएंगे
चिकनी मिट्टी पर बच्चे कूदेंगे फांदेंगें,
गूंधेंगे माटी को नरम बनाएंगे।
इंद्रधनुष का धागा बनाएंगे,
चलो चलो चलो, चलो बच्चों चलो!
चंदा को गोल गोल घुमाएंगे
देखो सुराही की गर्दन बनाएंगे।
तारों के झिलमिल से रंग सजाएंगे।
तुम जो हंसो तो इन्हें भी हंसाएंगे।
सूरज की भट्टी में इन्हें पकाएंगे
बच्चों चलो चलो चलो!
चंदा के चाक कल्पना की अल्पना बनायेंगे।
प्यारे हैं, न्यारे हैं, मेरे राज दुलारे है,
नाजुक है पर पक्के है
खूब खूब पकाए है, फिर भी कच्चे हैं
क्योंकि बच्चे हैं।
पक्के कच्चे सच्चे बच्चे
क्षितिज की रेखा पर इनको सजाएंगे।
चलो चलो चलो, चलो बच्चों चलो।
चंदा के चाक पे कल्पना की अल्पना में,
इक सच्ची दुनिया रचाएंगे।
रेणु वशिष्ठ

चंदा का चाक और सपनों की दुनिया

एक सुनहरी और ठंडी रात थी। आसमान में चमकते चाँद को देखकर कुछ नन्हें बच्चों के मन में एक अनोखा विचार आया। उन्होंने एक-दूसरे से कहा, "चलो बच्चों, आज हम सिर्फ ज़मीन पर नहीं, बल्कि सीधे चंदा के चाक पर चलेंगे और वहाँ अपनी एक सपनों की नई दुनिया बसाएंगे!"

सारे बच्चे खुशी से झूमते हुए "चलो-चलो, जल्दी चलो!" कहते हुए चल पड़े। वे अपने साथ धरती की सोंधी-सोंधी माटी और बादलों का थोड़ा सा ठंडा पानी भी साथ ले गए।

जब वे चंदा के पास पहुँचे, तो उन्होंने उस अंतरिक्ष की माटी में पानी मिलाया। फिर क्या था? चिकनी-चिकनी मिट्टी पर बच्चे खुशी से कूदने-फांदने लगे और अपने नन्हे हाथों से उस माटी को गूँथ-गूँथकर एकदम नरम बना दिया। उन्होंने आसमान के सात रंगों वाले इंद्रधनुष का धागा निकाला और चंदा के चाक को गोल-गोल घुमाने लगे।

चाक के घूमते ही उन्होंने मिट्टी से एक सुंदर सी सुराही की गर्दन और प्यारे-प्यारे बर्तन बनाने शुरू कर दिए। उन पर आसमान के टिमटिमाते तारों के झिलमिल रंग सजाए गए। बच्चों की हँसी इतनी प्यारी थी कि ऐसा लगा मानो वे बर्तन भी बच्चों को देखकर हंस रहे हों! इसके बाद, उन्होंने सूरज की सुनहरी भट्टी में उन सबकाे पकाया ताकि वे मजबूत हो सकें।

चंदा के इस बड़े से चाक पर कल्पना की एक अद्भुत अल्पना रच दी गई थी।

वहाँ खड़े वे बच्चे बहुत प्यारे और न्यारे थे—वे सब रेणु के राजदुलारे थे। वे भले ही उम्र में नाजुक और छोटे थे, पर उनके इरादे पक्के थे। उन्हें खूब प्यार से गढ़ा और पकाया गया था, फिर भी वे थोड़े कच्चे थे... और हों भी क्यों न, आख़िर वे प्यारे-प्यारे जो बच्चे थे!

वे पक्के, कच्चे और सच्चे बच्चे, अपनी बनाई इस सुंदर दुनिया को आसमान की आखिरी छोर यानी क्षितिज की रेखा पर सजाकर बहुत खुश हुए।

और इस तरह, चंदा के चाक और कल्पना की अल्पना में बच्चों ने मिलकर एक सचमुच की सपनों जैसी दुनिया रचा ली!

नटखट तितली और फूलों की महक

 




*तितली तितली*
आओ आओ तितली पकड़ें,
आहा! आहा! तितली पकड़ें।
रंग बिरंगी कैसी तितली,
कैसी तितली रंग बिरंगी।
भागो भागो चकाचौंध है,
रंग बिरंगी रूप सुनहरी,
कैसे मुझको चकमा दे जाए,
पकड़ ना पाऊं, फिर फिर उड़ जाए।
तितली तितली पकड़ो तितली,
आओ आओ पकड़े तितली।
जो देखे वो खुश हो जाए,
ऐसी प्यारी तितली तितली।
दबे पांव जब पीछे पहुंचे,
हाथ बढ़ाकर पंख जो पकड़े,
इधर से निकली, उधर से खिसकी,
ऐसी प्यारी तितली तितली।
उछाल कूद कुछ ऐसी कराई
इस क्यारी से उस क्यारी तक,
फूल फूल पर जा इतराई,
हम मंडराए तितली तितली,
मस्त बना गई हमको तितली।
तितली पीछे जंगल पहुंचे,
छूट गए सब मंदिर मस्जिद,
मिल गये हमको बिल्ली बंदर,
तितली तितली, इधर से निकली,
उधर से खिसकी।
मेढक आया टर्र टर्र करता,
कुट कुट करती गिलहरी आई,
खरगोश ने छलांग लगाई,
कछुआ दौड़े मधम मद्धम।
तितली तितली
केंचुआ भी रेंगता आया,
स्नेल अपना घर साथ लाई,
कोई हमको नहीं है भाया,
तितली पर ही मन है आया।
तितली तितली
तितली संग हम दौड़े भागे
फूल फूल पर हम मंडराए।
थक गए भैया हम तो देखो,
पकड़ ना पाए , उड़ गई तितली।
हम फूलों की सुगंध ले आए।
आहा! आहा!सुगंध ले आए।
रेणु वशिष्ठ
679 शांतनु पथ विद्युत नगर A
अजमेर रोड जयपुर 302021
स्वरचित मौलिक रचना

बाल-मन की मासूमियत, चंचलता और प्रकृति के आंचल में दौड़ते-भागते बच्चों की एक बहुत ही सुंदर और प्यारी कहानी है:

तितली और चंचल कदम

एक सुनहरी धूप वाली सुबह थी। चारों ओर खिले हुए सुंदर फूलों पर रंग-बिरंगे फूलों की महक छाई थी। तभी वहाँ एक बहुत ही प्यारी, रंग-बिरंगी और सुनहरी रूप वाली तितली उड़ती हुई आई। उसके पंखों के रंग ऐसे थे कि जो भी उसे देखता, उसका मन खुशी से झूम उठता।

दो छोटे-छोटे बच्चे, जिनकी आँखें उत्सुकता से चमक रही थीं, उस तितली को देखकर चहक उठे— "अरे देखो! तितली! आओ-आओ, तितली पकड़ें!"

वे दोनों हँसते-भागते उसके पीछे हो लिए। तितली भी बड़ी नटखट थी। वह उन्हें ऐसा चकमा देती कि जैसे ही बच्चे दबे पाँव धीरे-धीरे पीछे पहुँचकर अपने नन्हे हाथ उसके पंख पकड़ने के लिए बढ़ाते, तितली "फुर्र" से इधर से निकलकर उधर खिसक जाती!

कभी वह इस क्यारी के फूल पर बैठती, तो कभी उस क्यारी पर इतराती हुई फुदक जाती। उसने बच्चों को इस क्यारी से उस क्यारी तक ऐसी उछल-कूद कराई कि वे थकने के बावजूद मजे से उसके पीछे-पीछे मंडराते रहे। तितली ने तो उन बच्चों को बिल्कुल मस्त ही कर दिया था!

भागते-भागते तितली के पीछे-पीछे वे बच्चे गाँव या मोहल्ले के एक छोटे से जंगल और बाग़ की तरफ पहुँच गए। वहाँ पहुँचते ही पीछे मंदिर और मस्जिद छूट गए, और रास्ते में उन्हें नए-नए प्यारे दोस्त मिल गए। टर्र-टर्र करता हुआ एक मेंढक आ गया, कुट-कुट करती गिलहरी फुदक उड़ी, एक खरगोश ने लंबी छलांग लगाई, तो कछुआ मद्धम-मद्धम अपनी चाल से चलने लगा। केंचुआ भी धीरे-धीरे रेंगता हुआ आ गया और अपना छोटा सा घर साथ लिए हुए एक स्नेल (घोंघा) भी वहाँ आ निकला।

लेकिन बच्चों का मन तो इन सब पर आया ही नहीं! उन्हें तो बस अपनी वही प्यारी तितली भा रही थी। वे चिल्लाए— "तितली तितली! कोई हमको नहीं भाया, हमारा मन तो बस तितली पर ही आया है!"

तितली के संग-संग वे बच्चे भी खूब दौड़े-भागे और हर फूल पर उसके साथ मंडराते रहे। आखिर में, दौड़ते-दौड़ते वे बुरी तरह थक गए। भौंचक्के होकर उन्होंने देखा कि तितली तो हाथ आई ही नहीं, और वह उड़कर आसमान में दूर निकल गई।

तितली भले ही हाथ नहीं आई, लेकिन जब वे बच्चे अपने घर लौटे, तो उनके छोटे-छोटे नन्हे मन और कपड़े फूलों की भीनी-भीनी खुशबू और प्रकृति की अनमोल सुगंध से महक रहे थे। वे खुशी से बोल उठे— "अरे वाह! तितली हाथ न सही, पर हम फूलों की प्यारी सुगंध तो ज़रूर ले आए!"