Saturday, June 13, 2026

#Panchkosh The first stage of child development 0 to 7 years annamaykosh

  



#NEP20 has recommended to design the curriculum based on #Panchkosh The first stage of child development 0 to 7 years is all about physical development the annamayya kosh, the development of the earth element. The preschools work more on the sensory development than the physical growth.
In these years following yam niyam and asan (the first three steps of ashtang yog) are enough. The activities for these children must be based on these three steps. Cleanliness, discipline and posture important aspects of child development.
Asan....sitting squatted on a mat or durrie will help a lot to build earth element and balanced posture where as modern parents and schools make them sit on the plastic chairs. Weak earth element means weak mooladhar chakra, that leads to lack of confidence....
Bakhal PreSchool Curriculum Researchers Pvt Ltd observes very closely to design the curriculum which helps the child to grow at the natural pace.
What's the hurry, why are we rushing and damaging the child's natural growth.
कुछ भी चलता है, कुछ भी। तीन साल के बच्चे को प्राणायाम सिखाकर उसके जीवन के आयाम बदल दो प्राकृतिक को अप्राकृतिक कर दो। फिर कह दो कलयुग के बच्चे हैं।

उच्चारण

 प्रणाम,

उच्चारण (सही तरीके से बोलना) न केवल भाषा को स्पष्ट और समझने योग्य बनाता है, बल्कि यह आंतरिक ऊर्जा और उत्तम न्यूरल नेटवर्क को उत्तेजित कर कंपन स्पंदन पैदा करता है जो तरंग बन ब्रह्माण्डीय ऊर्जाओं के साथ तारतम्य स्थापित करता है।
जितना स्पष्ट उच्चारण होगा तरंग उतनी ही प्रभावशाली होगी और उतना ही प्रभावशाली व्यक्तित्व होगा।
संगीत में यदि एक स्वर भी ऊपर नीचे हो जाए तो बेसुरा हो जाता है उसी प्रकार बोलते समय यदि एक अक्षर का उच्चारण भी स्पष्ट न हो तो वार्तालाप या संवाद में अधिक अंतर नहीं पड़ता परंतु तरंग में अंतर पड़ जाता है। आपकी बात प्रभावशाली नहीं रहती है। भाव और अर्थ की स्पष्टता: सही और स्पष्ट उच्चारण से संवाद बेहतर होता है और अर्थ का अनर्थ होने से बचता है। यह श्रोता को वक्ता के संदेश से सीधे जोड़ता है।
वेदों और शास्त्रों में मंत्रों के सटीक उच्चारण पर बहुत जोर दिया गया है, क्योंकि इनकी ध्वनि तरंगें वातावरण और साधक के भीतर एक दिव्य आभामंडल तैयार करती हैं।
हम उस युग में जी रहे हैं जहां हमारी वाणी, भाषा , शब्द, अक्षर सभी मंत्र समान कार्य कर रही हैं। यदि हमारे सामान्य बोलचाल की भाषा में भी उच्चारण स्पष्ट हो तो बिना प्रयास के सहजता से पूर्ण व्यक्तित्व विकास संभव है।
उच्चारण की महिमा को जानते समझते हुए प्रसंग वशिष्ठ चेरिटेबल ट्रस्ट के सहयोग से बाखल प्री स्कूल करिकुलम रिसर्चर्स प्राइवेट लिमिटेड ऑनलाइन कक्षा आयोजित करने जा रहा है।
सिलेबस रहेगा : ध्वनि, अक्षर, शब्द ।
कक्षा सभी आयु वर्ग के लिये उपयोगी है।
आयोजक
रेणु वशिष्ठ
मैनेजिंग ट्रस्टी प्रसंग वशिष्ठ चेरिटेबल ट्रस्ट
निदेशक बाखल प्री स्कूल करिकुलम रिसर्चर्स प्राइवेट लिमिटेड

प्रकृति अखंड है

 

https://www.facebook.com/reel/3399281580250369


शिव कृपा करो,
शिव आज्ञा दो,
शिवाग्नि प्रवाहित हो।
प्रणाम 🙏
यह तो आधुनिक विज्ञान की (fragmented)रिपोर्ट है, क्योंकि आधुनिक विज्ञान खंड खंड करके शोध कर रहा है । जबकि प्रकृति अखंड है।यदि प्रकृति के प्राकृतिक स्वरूप के आधार पर जानने का प्रयास करें जहां प्रकृति का हरेक कण अंतर्निर्भर(interdependent) है।
हममें से अधिकतर को यह मालूम नहीं होगा कि चंद्रमा फलों में रस भरता है, औषधियों में, जड़ी बूटियों में औषधि तत्व बनाने का कार्य करता है। चंद्रमा और जल तत्व का संबंध हम सभी को मालूम है जो हमें ज्वार भाटा के रूप में छोटी कक्षाओं में पढ़ाया जाता है।
रस जल ही है, जल रस ही है। पेड़ों की जड़ों से जल ऊपर जाता परंतु पेड़ की मैकेनिज्म के साथ साथ जल को ऊपर खींचने में सूर्य और चंद्रमा का भी बहुत बड़ा योगदान है। दिन में सूर्य अपनी गर्मी से जल ऊपर खींचता है और रात में चंद्रमा जल को फलों में रस में परिवर्तित करता है। नारियल के पानी को औषधीय गुण देने का कार्य चंद्रमा ने किया। हर प्रक्रिया में पांचों तत्त्व और नवग्रहों का योगदान होता ही है।
पृथ्वी पर कोई भी वनस्पति ऐसी नहीं जिसमें औषधीय गुण ना हो, यहां तक कि खरपतवार भी, जिन्हें हम जानकारी के अभाव में उखाड़कर फेंक देते हैं।
जैसे कॉलोनाइजर्स नई नई आवासीय योजनाएं लेकर आते हैं वैसे ही सृष्टिके रचयिता ने पृथ्वी पर इस संसार की रचना की। जैसे कॉलोनाइजर्स सोसाइटी में पेड़ पौधे बगीचा आदि लगाने के लिए horticuluturist की मदद लेते है,
A horticulturist is a professional who applies the art and science of plant cultivation to grow, develop, and improve fruits, vegetables, flowers, and ornamental plants. They blend scientific principles with practical gardening to increase crop yields, improve nutritional value, and enhance plant resistance to disease. वैसे ही रावण को पृथ्वी पर भेजा गया वनस्पति जगत को रचने के लिए, रावण ने एक एक वनस्पति को वेधशाला में बनाया या कहे प्रयोग करके देखा जा, जाँचा, परखा, निरीक्षण परीक्षण किया, जो भी पृथ्वी के जीव जंतुओं, प्राणियों के लिए उपयोगी वनस्पति नहीं थी उसने उसे पृथ्वी पर रहने ही नहीं दिया। कितना अद्भुत है यह सब जानना समझना। हम रावण के पुतले जलाते रहते हैं हमारे अल्प ज्ञान के कारण।
Google करके इस फैक्ट को वेरिफाई करने की कोशिश करेंगे तो शायद आपको उत्तर नहीं मिलेगा क्योंकि गूगल पर आधी अधूरी जानकारी उपलब्ध रहती है। यदि हम इधर इस विषय पर चर्चा कर रहें हैं तो AI सतर्क हो जाएगा और जानकारी इक्कठी करने लगेगा। परंतु ये सब पढ़ने के बाद कितने लोग अपनी उत्सुकता को बढ़ाएंगे इस जानकारी के सत्य को अपने सत्य से उजागर करने का प्रयास करेंगे।
हम रावण का धन्यवाद करें। 🙏🙏हम सृष्टि के रचयिता से अनुगृहीत रहें। हमें अपनी लीला का अंश बनाया।
अपने role को पूर्ण भाव से निभायें। आप सूर्य का तेज है या चंद्रमा का रस आपका हर हाव भाव कुछ बना रहा है, कुछ बिगाड़ रहा है, फिर से कुछ बना रहा है। बीज से फल और फल में फिर से बीज। बनते बिगड़ते, बिगड़ते बनते रहो।
सत्यम शिवम सुंदरम तभी मिलेगा।
बस एक बात का ध्यान रखें, सदी के महासंदेश सत्य से प्रेम, प्रेम से कर्म करें।
प्रसंग प्रणाम से प्रणव तक सत्य की विजय यात्रा में भाग लें।
Look beyond imperfections
Be 'PRASANG' Be Joyous
रेणु वशिष्ठ
मेरी काया मेरी वेधशाला से
बुधवार 10 जून 2026
प्रातः 7.32

मृदा से जुड़े बच्चों के लिए कुछ आसान खेल

 

योग दिवस आ रहा है तो किसी भी एक्टिविटी के आगे Yog लगा दो बस नाम को काम हो गया।
एक किसी प्री स्कूल का वीडियो अभी अभी देखा, उत्सुकता वश पूरा देखा कि Yog in Mud क्या होता है? कैसे होता है? योग का य भी दिखाई नहीं दिया , बच्चे सिर्फ कीचड़ (mud) में उछल कूद कर रहे थे। मिट्टी में सने हाथों से हाथ की छाप भी काग़ज़ पर लगवाई गई। हां बोर्ड पर अवश्य लिखा था 'Yog in Mud'
निसंदेह,मिट्टी में खेलना बहुत अच्छी गतिविधि है। उसको सिर्फ mud play भी कहा जा सकता है।
मैने नीचे आपकी सहायतार्थ कुछ मिट्टी के खेल लिखे हैं। कोई भी बच्चों के साथ स्वयं भी खेल सकता है।
कुछ दोहे भी बच्चों को साथ साथ सिखा सकते हैं:-
मिट्टी हमारी संस्कृति, जीवन और संस्कारों का आधार है। मिट्टी पर कबीर दास जैसे महान संतों से लेकर कई कवियों ने खूबसूरत दोहे लिखे हैं। ये दोहे मिट्टी की महिमा, इंसान के उससे जुड़े रिश्ते और उसके महत्व को बताते हैं।
कबीर दास जी का दोहा:माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोहे।एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूंगी तोहे॥
धरती और इंसान का रिश्ता:-माटी से उपजे फसल, भरे सभी का पेट।मिले इसी से जिंदगी, माटी को मत मेट॥
मिट्टी की महिमा:-
मिट्टी से ही बन बना, काया का यह रूप।मिट्टी में ही मिल गया, राजा हो या भूप॥
किसान और माटी:-
समझ किसान कुम्हार ने, इस मिट्टी का मोल।लोट-पोट इस में रहे, जी भर किया किलोल॥
मिट्टी का अनमोल मोल:-
मिट्टी तो अनमोल है, मत कह इस को धूल।कण-कण इसका ही बने, हर जीवन का मूल॥
बच्चों के लिए मिट्टी या मृदा से जुड़े खेल (Soil Play) उनके शारीरिक और मानसिक विकास के लिए बेहद फायदेमंद हैं। इनसे बच्चों की रचनात्मकता (creativity) बढ़ती है, हाथ और आंखों का तालमेल बेहतर होता है, और उन्हें प्रकृति को समझने में मदद मिलती है।

मृदा से जुड़े बच्चों के लिए कुछ आसान खेल :
*रचनात्मक और कलात्मक खेल मिट्टी की मूर्तियां:-*
बच्चों को गीली मिट्टी देकर खिलौने, जानवर या बर्तन बनाने दें।
*मिट्टी से चित्रकारी:-*
मिट्टी में थोड़ा पानी मिलाकर रंग बनाएं और ब्रश या उंगलियों से कागज़ पर पेंटिंग करे।
*छाप बनाना:-*
गीली मिट्टी को चपटा करके उस पर पत्तों या फूलों को दबाएं और सुंदर डिज़ाइन बनाएं।
*शैक्षिक खेल (Educational Games)मिट्टी की परतें:-*
बच्चों को कांच के जार में मिट्टी, रेत और पानी डालकर अलग-अलग परतें (Soil Layers) बनाना सिखाए।
*कीड़े-मकौड़ों की खोज:-*
बच्चों को मिट्टी खोदकर केंचुए या छोटे कीड़े ढूंढने का काम दें, इससे वे जीव-विज्ञान सीखेंगे।
*कीचड़ की दौड़:-*
घर के बाहर बारिश के मौसम में कीचड़ में बच्चों को कूदने दें, इससे उनकी मांसपेशियां मजबूत होती हैं।
*बागवानी के खेल पौधे लगाना* :- बच्चों को मिट्टी में छोटे बीज बोना और उनमें पानी डालना सिखाएं।
*मिट्टी का घर:-* बगीचे में पत्थरों और टहनियों की मदद से मिट्टी का छोटा सा घर या किला बनाएं।
*मिट्टी के लड्डू बनाना*
*मिट्टी के ढेलों से मूर्ति बनाना*
आदि बहुत से खेल बच्चों के पृथ्वी तत्व को पोषित करते है। जिससे उनमें आत्मविश्वास और निडरता का भाव विकसित होता है।



आलू-परवल कैसे उछलते हैं?

 

एक पतीली में आलू और परवल उबलते हैं। नीचे अंगीठी जल रही है। एक बालक आकर देखता है तो बड़ी आश्चर्यदृष्टि से कहता है, माँ देखो आलू-परवल कैसे उछलते हैं! माँ अंगीठी बुझा देती है। आलू-परवल अब स्थिर रह जाते हैं। बालक पूछता है, माँ आलू-परवल अ​ब क्यों नहीं उछलते? माँ कहती है, वो पहले भी अपनी शक्ति से नहीं उछलते थे, पतीली के नीचे अंगीठी की जो तापशक्ति है, उससे उछलते थे। अंगीठी के बुझते ही वो निष्प्राण रह जाते हैं।

Children are born curious, and how adults respond to this instinct shapes their future. Satiating this curiosity well turns learning into a joyful, lifelong habit. In contrast, ignoring or shutting down their questions can cause them to lose this natural drive.

Prasang Vashistha Charitable Trust and Bakhal Preschool curriculum developers ask to intricately weave the inner and outer world in your response , only the awakened adults can do it.
Inner and outer worlds both reciprocate well and resonate in each other, it's a pure science.
To enhance your vision, join our mission to awaken every teacher. Abreast with the need of the hour.
Knowledge Economy vs Wisdom Economy
Train not , Expand the mind.
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ऊर्जा बाहर की ओर बहती है या भीतर की ओर उतरती है


 शिव कृपा करो,

शिव आज्ञा दो,

शिवाग्नि प्रवाहित हो।

प्रणाम,
मनुष्य के भीतर जितनी ऊर्जा होती है, वह या तोबाहर की ओर बहती है या भीतर की ओर उतरती है। बाहर की ओर बहती है तो संसार बनाती है, महत्वाकांक्षाएँ बनाती है, इच्छाएँ बनाती है, भोग बनाती है। 
यदि यम, नियम, आसान, प्राणायाम और प्रत्याहार द्वारा भीतर की ओर मुड़ती है तो वही ऊर्जा धारणा,ध्यान बन जाती है, अंततः समाधि बन जाती है, आत्मबोध का माध्यम बन जाती है।
समस्या यह नहीं है कि मनुष्य के पास ऊर्जा नहीं है। समस्या यह है कि जो ऊर्जा उसे भीतर ले जा सकती थी, वही अधिकांशतः इंद्रियसुखों, चिंताओं, प्रतिस्पर्धाओं, क्रोध, ईर्ष्या और वासनाओं में खर्च हो जाती है। जब तक मनुष्य को इसका बोध होता है, तब तक जीवन की डांवाडोल हो चुका होता है।
यही जीवन की सबसे बड़ी विडंबना है।
युवा अवस्था वह अवस्था है जब शरीर में बल, मन में उत्साह, संकल्प में तेज और प्राणों में प्रचुरता होती है। युवा मन को संसार भी उसी आकर्षित करता है। संसार का आकर्षण — "इस ऊर्जा को भोग में लगाता है।" 
माया के भोग साधन जुटाने में स्वयं का बोध ही नहीं रह जाता।ऊर्जा क्षय होती रहती है। यदि ऊर्जा को भोग और बोध दोनों में बराबर बराबर लगाया जाए तो दोनों सध सकते हैं।
दोनों दिशाएँ एक साथ पूरी शक्ति से नहीं चल सकतीं। तीन चौथाई ऊर्जा भीतर और एक चौथाई ऊर्जा संसार में लगाई जाए तो शांतिमय, मंगलमय जीवन की कल्पना की जा सकती है। हम एक चौथाई ऊर्जा भीतर सहेजते हैं (जो प्राकृतिक रूप से होती ही है) और तीन चौथाई ऊर्जा संसार में छोड़ते हैं। ऊर्जा का बहाव शरीर में ठहरता नहीं , क्योंकि भीतर ठहराव नहीं, स्थिरता नहीं। चंचल ऊर्जा ब्रह्मांड से आप में प्रवाहित होती है और सीधी बाहर निकल जाती है आपके दस द्वारों से। संसार का पूरा रसास्वादन, इच्छाओं की तृप्ति , धन और प्रतिष्ठा अर्जित करने के लिए।  सारा ईंधन जल जाता है और फिर निढाल होकर बैठे रहते हैं। भोग के साथ साथ बोध पर भी  ऊर्जा लगती रहे तो वही आत्मबोध  वृद्धावस्था का मनोरंजन बन जाता है।
 युवावस्था में ऊर्जा का प्रवाह तीव्र गति से होता है, उसी ऊर्जा के प्रवाह से endocrine glands activate होती हैं, हार्मोन स्रावित होते हैं। शुरू में आरंभ में ऊर्जा के प्रवाह को हर बच्चा झेल नहीं पाता और कई प्रकार की शारीरिक , मानसिक परेशानियों का सामना करता है। जो परेशानियां नहीं होती हैं उसके ऊर्जा को ग्रहण करने की प्रक्रिया का हिस्सा होती हैं।जिसे परिजन बीमारी समझकर चिता का विषय बना लेते हैं। बहुत सा बेसिरपैर का ज्ञान दे दिया जाता है। प्राचीन गुरुकुलों में बालकों को केवल शास्त्र नहीं पढ़ाए जाते थे, बल्कि जीवन की दिशा दी जाती थी। अनुशासित किया जाता था। ताकि वे भीतर से परिपक्व होकर संसार में रहते हुए भी अपने केंद्र को न भूलें।
जिस भूमि में बीज समय पर बोया जाता है, वही वृक्ष बनती है। जो बीज सूखी भूमि पर बहुत देर से डाला जाए, उसके अंकुरित होने की संभावना कम हो जाती है।
यही कारण है कि ब्रह्मचर्य को महत्व दिया जाना चाहिए।
ब्रह्मचर्य का अर्थ केवल शारीरिक संयम नहीं है। उसका वास्तविक अर्थ है — अपनी जीवनशक्ति का संरक्षण और उसका उच्चतर दिशा में रूपांतरण करना। ब्रह्मचर्य वह कला है जिसमें मनुष्य अपनी बिखरी हुई ऊर्जा को समेटता है, उसे एकाग्र करता है और उसे चेतना के उत्कर्ष में लगाता है।जिस प्रकार सूर्य की बिखरी हुई किरणें सामान्य गर्मी देती हैं, परंतु वही किरणें लेंस के माध्यम से एक बिंदु पर केंद्रित हो जाएँ तो अग्नि प्रज्वलित कर देती हैं, उसी प्रकार बिखरी हुई जीवनशक्ति केवल सामान्य जीवन जीती है, जबकि एकत्रित जीवनशक्ति आत्मबोध का द्वार खोल सकती है।
यह सत्य है कि इतिहास में कुछ ऐसे महापुरुष हुए हैं जिन्होंने सामान्य नियमों से भिन्न मार्ग अपनाकर भी उच्चतम आध्यात्मिक अवस्थाएँ प्राप्त कीं। किंतु अपवाद कभी नियम नहीं होते। उन महापुरुषों के पास जन्मजात या अर्जित रूप से प्राणशक्ति का इतना विशाल भंडार था कि वे सामान्य सीमाओं से परे जा सके। साधारण मानव को अपवादों की नहीं, सिद्धांतों की चिंता करनी चाहिए।जो व्यक्ति अपनी ऊर्जा को निरंतर इच्छाओं में खोता रहता है, वह ध्यान में स्थिर नहीं हो सकता। और जो अपनी ऊर्जा को सहेजना सीख लेता है, उसके भीतर स्वाभाविक रूप से मौन, एकाग्रता और अंतर्दृष्टि का जन्म होने लगता है।
सत्य का बीज जितना जल्दी बोया जाए, उतना अच्छा है। किशोरावस्था में बोया जाए तो वह दिशा बन जाता है। युवावस्था में बोया जाए तो वह साधना बन जाता है। और यदि वृद्धावस्था में बोया जाए तो भी उसका मूल्य है, पर तब वह संघर्ष अधिक और संभावना अपेक्षाकृत कम लेकर आता है।इसलिए यदि जीवन में कभी आत्मबोध की आकांक्षा जागे, तो उसे भविष्य पर मत टालिए। अध्यात्म उस दिन से आरंभ होता है जिस दिन मनुष्य यह समझ लेता है कि उसकी सबसे बड़ी पूँजी समय नहीं, धन नहीं, बल्कि उसकी जीवनशक्ति है।
जिसने अपनी ऊर्जा को पहचान लिया, उसने साधना का पहला द्वार खोल लिया।और जिसने अपनी ऊर्जा को संभाल लिया, उसके लिए आत्मा तक पहुँचने का मार्ग दूर नहीं रह जाता। आत्म बोध से आत्मशक्ति मिलती है, "मैं हूं ना " भीतर से आवाज गूंजती रहती है।
आप कुछ करें या ना करें , आत्मशबोध, आत्मशक्ति हेतु सदी के महासंदेश सत्य से प्रेम, प्रेम से कर्म करें।
प्रसंग प्रणाम से प्रणव तक सत्य की विजय यात्रा में भाग लें।
Look beyond imperfections 
Be 'PRASANG' Be Joyous 
रेणु वशिष्ठ 
#imbibevalues #buildcharacter #buildnation #nochildleftout #nochildleftbehind 
॥ 🙏

Wednesday, April 23, 2025




 प्रणाम,

अंत में तो अपने प्रेम में पड़ना ही होगा, संसार का प्रेम तो भुलावा है। संसार के प्रेम में कोई दूसरा चाहिए होता है, जहां दो हो गए द्वैत हो गया। द्वैत, मन बुद्धि अहंकार में डोलता है। खंड खंड रहता है, टूटा टूटा। आपस में खंड टकराते हैं । अंत में टूटते टूटते आप एक कण भर रह जाते हैं, वही कण आपका प्रकाश है , उस कण से प्रेम करें , वहीं अद्वैत की साधना शुरू हो जाती है। अखंड मंडलाकार प्रकाशित होता है। फिर कोई दूसरा नहीं होता। आप ही आप होते है, सब ही राम समाया का प्रत्यय दृष्टिगत होगा।
स्वयं से प्रेम करना निस्वार्थ होने की पहली सीढ़ी है। अधिक जानने समझने के लिए सदी के महासंदेश, सत्य से प्रेम, प्रेम से कर्म करें का अनुसरण करें।
सत्यमेव जयते
प्रसंग प्रणाम से प्रणव तक सत्य की विजय यात्रा में भाग लें।
रेणु वशिष्ठ
मेरी काया मेरी वेधशाला से
28.3.2025
नोट:- विचार व्यक्तिगत अनुभव से उद्भूत हैं, जरूरी नहीं शास्त्र सम्मत हों अतः किसी तर्क वितर्क के लिए बाध्य नहीं हैं। यदि किसी को तर्क चाहिए तो अपनी काया को वेधशाला बनाकर अनुभवात्मक निरीक्षण परीक्षण कर अपने उत्तर प्राप्त करें।