Tuesday, October 27, 2026

इन्द्रियों से आत्मतत्त्व तक

 




इन्द्रियों से आत्मतत्त्व तक एक दार्शनिक अभिलेख


इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः। 
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः॥ — श्रीमद्भगवद्गीता 3.42।

 यह श्लोक मनुष्य की आन्तरिक सत्ता, उसकी अनुभव-प्रक्रिया, मानसिक प्रवृत्तियों, विवेकशक्ति और आत्मतत्त्व के पारस्परिक सम्बन्ध को उद्घाटित करने वाला एक महत्त्वपूर्ण दार्शनिक सूत्र है। मनुष्य संसार को आँखों से देखता है, कानों से सुनता है, त्वचा से स्पर्श अनुभव करता है, जिह्वा से रस ग्रहण करता है और नासिका से गन्ध पहचानता है, किन्तु उसका जीवन केवल इन्द्रियों द्वारा प्राप्त अनुभवों से संचालित नहीं होता। एक ही दृश्य देखकर दो व्यक्तियों के विचार अलग हो सकते हैं, एक ही परिस्थिति में कोई व्यक्ति संयम रख सकता है, जबकि दूसरा आवेश में निर्णय कर बैठता है। इसका कारण यह है कि इन्द्रियानुभव, मानसिक प्रतिक्रिया, बुद्धि का निर्णय और आत्मतत्त्व एक ही स्तर की वस्तुएँ नहीं हैं। इन्द्रियाँ बाह्य विषयों को ग्रहण करती हैं, मन उन विषयों के प्रति आकर्षण, अरुचि, स्मृति, कल्पना और भावनात्मक प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है, बुद्धि उन अनुभवों तथा प्रतिक्रियाओं का परीक्षण करके उचित-अनुचित का निर्णय करती है और वेदान्त आत्मतत्त्व को शरीर, इन्द्रियों, मन तथा बुद्धि से भिन्न, उनके अनुभवों का साक्षी मानकर उसका अन्वेषण करता है। यहाँ ‘पर’ शब्द का अर्थ केवल ऊपर या आगे नहीं, बल्कि अधिक सूक्ष्म, अधिक आन्तरिक अथवा नियामक स्तर से है। श्लोक का अन्वय है—इन्द्रियाणि पराणि आहुः, इन्द्रियेभ्यः मनः परम्, मनसः तु बुद्धिः परा, यः बुद्धेः परतः तु सः। अर्थात् इन्द्रियों को शरीर से श्रेष्ठ कहा गया है, इन्द्रियों से मन श्रेष्ठ है, मन से बुद्धि श्रेष्ठ है और जो बुद्धि से भी परे है, वह आत्मतत्त्व है। इस क्रम का उद्देश्य मनुष्य को अपनी आन्तरिक शक्तियों का बोध कराना और उन्हें विवेकपूर्ण दिशा में संचालित करने की प्रेरणा देना है। इन्द्रियाँ संसार से सम्पर्क के द्वार हैं, परन्तु इन्द्रियानुभव अपने-आप में सम्पूर्ण सत्य नहीं है। आँख दृश्य दिखाती है, लेकिन दृश्य का सम्पूर्ण कारण नहीं बताती; कान शब्द सुनता है, लेकिन वक्ता का वास्तविक अभिप्राय अपने-आप नहीं जानता। किसी व्यक्ति का बाहरी व्यवहार दिखाई दे सकता है, पर उसके भीतर का उद्देश्य केवल दृश्य से निश्चित नहीं किया जा सकता। इसलिए इन्द्रियानुभव आवश्यक है, किन्तु उसकी समुचित व्याख्या के लिए मन और बुद्धि की आवश्यकता होती है। इन्द्रियों का संयम उनके निषेध का नाम नहीं है; देखना, सुनना, बोलना और कर्म करना जीवन के स्वाभाविक साधन हैं। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब इन्द्रियाँ विवेक के अधीन रहने के स्थान पर मनुष्य के निर्णयों पर एकाधिकार कर लेती हैं। भगवद्गीता कहती है—तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः। वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥ (गीता 2.61)। अर्थात् इन्द्रियों को संयमित करके परम लक्ष्य में स्थित रहना चाहिए; जिसकी इन्द्रियाँ वश में हैं, उसकी प्रज्ञा स्थिर होती है। इसका आशय संसार से आँखें फेर लेना नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए अपनी बुद्धि और विवेक को सुरक्षित रखना है। श्लोक का दूसरा चरण है—इन्द्रियेभ्यः परं मनः। इन्द्रियों से मन श्रेष्ठ है, क्योंकि इन्द्रियाँ विषयों को ग्रहण करती हैं, जबकि मन उन विषयों के प्रति आकर्षण, अरुचि, स्मृति, कल्पना और भावनात्मक प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है। एक व्यक्ति के सामने स्वादिष्ट भोजन रखा है; जिह्वा रस का अनुभव करती है, पर मन उसमें आसक्त हो सकता है। दूसरा व्यक्ति उसी भोजन को देखकर अपनी आवश्यकता, स्वास्थ्य, समय और कर्तव्य पर विचार कर सकता है। बाहरी विषय एक ही है, किन्तु मानसिक प्रतिक्रिया अलग-अलग है। मन केवल वर्तमान इन्द्रियानुभव से प्रभावित नहीं होता; वह स्मृतियों को पुनः सामने लाता है, भविष्य की कल्पना करता है और अनुपस्थित विषयों के प्रति भी इच्छा उत्पन्न करता है। इसीलिए मनुष्य कभी-कभी उस वस्तु के पीछे भी दौड़ता है, जो उसके सामने उपस्थित नहीं है। भगवद्गीता इस प्रक्रिया को स्पष्ट करती है—ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते। सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥ (गीता 2.62)। अर्थात् विषयों का बार-बार चिन्तन करने से उनमें आसक्ति उत्पन्न होती है, आसक्ति से कामना और कामना में विघ्न पड़ने पर क्रोध उत्पन्न होता है। किसी विषय को देख लेना और उसके बारे में बार-बार सोचते रहना एक बात नहीं है। इन्द्रियानुभव क्षणिक हो सकता है, लेकिन मन का पुनरावृत्त चिन्तन उसे इच्छा और आसक्ति में बदल सकता है। इसलिए साधना केवल बाहरी विषयों से दूरी बनाने का नाम नहीं, बल्कि अपने मन की गति को पहचानने और उसे उचित दिशा देने की कला भी है। इन्द्रिय विषय को सामने लाती है, मन उसे भीतर स्थान देता है। श्लोक का तीसरा चरण है—मनसस्तु परा बुद्धिः। मन से बुद्धि श्रेष्ठ है, क्योंकि मन संकल्प-विकल्प, विचारों की गति तथा मानसिक प्रतिक्रियाओं से सम्बन्धित है, जबकि बुद्धि परीक्षण, निश्चय, भेदबोध और निर्णय की शक्ति है। मन कह सकता है कि मुझे यह वस्तु चाहिए, लेकिन बुद्धि पूछ सकती है कि क्या यह वस्तु मेरे लिए उचित है। मन कह सकता है कि मैं अभी क्रोध में उत्तर दूँगा, लेकिन बुद्धि विचार कर सकती है कि मेरा उत्तर परिस्थिति को सुधारेगा या बिगाड़ेगा। मन किसी लाभ की ओर आकर्षित हो सकता है, जबकि बुद्धि उस लाभ के साधन, परिणाम, नैतिकता और दीर्घकालीन प्रभाव का परीक्षण कर सकती है। बुद्धि का कार्य केवल अधिक विचार करना नहीं, बल्कि विचारों के बीच उचित निर्णय करना है। यदि बुद्धि केवल स्वार्थ को अधिक कुशलता से पूरा करने लगे, तो वह धर्ममय विवेक नहीं कहलाएगी। धर्ममय बुद्धि को यह भी देखना होता है कि निर्णय सत्य, न्याय, कर्तव्य और लोकहित के अनुकूल है या नहीं। भगवद्गीता का निर्देश है—उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥ (गीता 6.5)। मनुष्य अपने द्वारा अपना उत्थान करे, अपने को अधोगति में न डाले, क्योंकि मनुष्य स्वयं अपना मित्र भी है और स्वयं अपना शत्रु भी। इसका आशय है कि मनुष्य अपनी मानसिक प्रवृत्तियों को पहचानकर, बुद्धि का परिष्कार करके और उचित कर्म का अभ्यास करके अपने जीवन की दिशा बदल सकता है। श्लोक का सर्वाधिक गहन अंश है—यो बुद्धेः परतस्तु सः। जो बुद्धि से भी परे है, वह आत्मतत्त्व है। बुद्धि अनुभवों, स्मृतियों, धारणाओं और तर्कों के माध्यम से कार्य करती है; वह किसी वस्तु का परीक्षण करती है, निष्कर्ष पर पहुँचती है और परिस्थितियों के अनुसार अपने निष्कर्ष को बदल भी सकती है। वेदान्त आत्मा को शरीर, इन्द्रियों, मन और बुद्धि से भिन्न जानने का प्रयास करता है। विचारों को जानना और विचार होना एक ही बात नहीं है; किसी निर्णय पर पहुँचना और उस निर्णय को जान पाना भी अलग-अलग स्तर हैं। जब मनुष्य कहता है कि मेरे मन में क्रोध उठ रहा है, तब वह क्रोध को अपने अनुभव का विषय बना रहा होता है। जब वह कहता है कि मेरी बुद्धि इस निर्णय को उचित मान रही है, तब वह बुद्धि के निर्णय पर भी विचार कर सकता है। यह आत्मनिरीक्षण मनुष्य को अपनी प्रत्येक मानसिक अवस्था के साथ अन्धी पहचान बना लेने से बचाता है। फिर भी आत्मा को साक्षी मानने का अर्थ यह नहीं कि मनुष्य अपने व्यवहार की जिम्मेदारी से मुक्त हो जाए। यह कहना कि मैं साक्षी हूँ, इसलिए मेरे कर्मों का मुझसे कोई सम्बन्ध नहीं, गीता के कर्मयोग का आशय नहीं है। आत्मबोध का उद्देश्य कर्तव्य से पलायन नहीं, बल्कि आसक्ति, अहंकार और अविवेक से मुक्त होकर उचित कर्म करना है। भगवद्गीता कहती है—तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर। असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः॥ (गीता 3.19)। अर्थात् आसक्ति से रहित होकर कर्तव्य कर्म करो; आसक्तिरहित कर्म करते हुए मनुष्य परम पद को प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार आत्मतत्त्व का बोध कर्म का निषेध नहीं करता, बल्कि कर्म के पीछे स्थित आसक्ति और अहंकार का परीक्षण करने की प्रेरणा देता है। गीता के इस सूत्र की पूरक व्याख्या कठोपनिषद् के रथरूपक में प्राप्त होती है—आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु। बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च॥ (कठोपनिषद् 1.3.3)। अर्थात् आत्मा को रथ का स्वामी, शरीर को रथ, बुद्धि को सारथि और मन को लगाम समझो। आगे उपनिषद् कहता है—इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान्॥ (कठोपनिषद् 1.3.4)। इन्द्रियों को घोड़े और विषयों को उनके विचरण के मार्ग कहा गया है। इस रूपक में शरीर साधन है, इन्द्रियाँ गति और अनुभव के माध्यम हैं, मन लगाम है तथा बुद्धि सारथि है। यदि लगाम अस्थिर है और सारथि विवेकहीन है, तो रथ उचित दिशा में नहीं चलेगा; किन्तु जब बुद्धि जागरूक है और मन संयमित है, तब इन्द्रियों की शक्ति उद्देश्यपूर्ण दिशा में प्रयुक्त हो सकती है। इसका अर्थ यह नहीं कि शरीर या इन्द्रियाँ शत्रु हैं। घोड़े न हों तो रथ आगे नहीं बढ़ेगा, किन्तु उन्हें दिशा देने वाला सारथि भी आवश्यक है। शक्ति का होना पर्याप्त नहीं, शक्ति का विवेकपूर्ण संचालन आवश्यक है। यही बात आधुनिक जीवन में भी लागू होती है। ज्ञान, तकनीक, धन, पद और प्रभाव सभी शक्तियाँ हैं। यदि इनके संचालन में विवेक और उत्तरदायित्व न हो, तो वही शक्ति विनाश का कारण बन सकती है; यदि ये धर्म और लोकहित के अधीन हों, तो आत्मोन्नति के साथ समाज का कल्याण भी सम्भव होता है।  साधना का उद्देश्य इन्द्रियों को दबाना और विचारों को बलपूर्वक समाप्त कर देना नहीं, बल्कि अपनी आन्तरिक शक्तियों को पहचानना, उनके पारस्परिक सम्बन्ध को समझना और उन्हें उचित दिशा देना है। इन्द्रियों का अनुशासन आवश्यक है, ताकि वे मन को निरन्तर विषयों की ओर खींचकर विवेक को दुर्बल न करें। मन का परिष्कार आवश्यक है, ताकि स्मृति, कल्पना, इच्छा और भावनाएँ निर्णय पर अनुचित अधिकार न जमा लें। बुद्धि का परिष्कार आवश्यक है, ताकि वह केवल स्वार्थ का समर्थन न करे, बल्कि सत्य, न्याय और धर्म का परीक्षण कर सके। आत्मतत्त्व की खोज मनुष्य को यह देखने में सहायता करती है कि उसकी प्रत्येक इच्छा ही उसका वास्तविक स्वरूप नहीं है, प्रत्येक विचार अन्तिम सत्य नहीं है और प्रत्येक मानसिक प्रतिक्रिया के अनुसार कार्य करना अनिवार्य नहीं है। यही आत्मसंयम का व्यावहारिक रूप है—इच्छा को पहचानना, उसके परिणाम को समझना, उचित-अनुचित का विवेक करना और फिर उत्तरदायित्वपूर्वक कर्म करना। पतञ्जलि योगसूत्र का सूत्र स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमिः॥ (योगसूत्र 1.14) इसी निरन्तर अभ्यास की आवश्यकता को स्पष्ट करता है। अभ्यास दीर्घकाल तक, बिना व्यवधान और श्रद्धापूर्वक किया जाए, तभी वह दृढ़ भूमि प्राप्त करता है। इसलिए आत्मसंयम किसी एक दिन का संकल्प नहीं, बल्कि बार-बार अपने मन की गति को पहचानने, बुद्धि को जागरूक रखने और उचित आचरण का अभ्यास करने की प्रक्रिया है। आत्मबोध की चर्चा कभी-कभी इस प्रकार की जाती है मानो उसका संसार और समाज से कोई सम्बन्ध न हो, परन्तु गीता के कर्मयोग में आत्मविकास और उत्तरदायी कर्म परस्पर विरोधी नहीं हैं। जो व्यक्ति अपनी इच्छाओं का परीक्षण करना सीखता है, वह दूसरों की इच्छाओं और अधिकारों का भी अधिक न्यायपूर्ण विचार कर सकता है। जो अपने क्रोध को पहचानता है, वह क्रोध के अधीन होकर निर्णय लेने से बच सकता है। जो लाभ के प्रति आसक्ति को समझता है, वह लाभ के लिए अनुचित साधन अपनाने से स्वयं को रोक सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि आत्मचिन्तन करने वाला प्रत्येक व्यक्ति स्वतः पूर्ण ज्ञानी हो जाता है; आत्मबोध का दावा और वास्तविक आचरण अलग बातें हैं। ज्ञान की सार्थकता उसके व्यवहार, उत्तरदायित्व, सत्यनिष्ठा और करुणा में भी परखी जानी चाहिए। यहाँ यह सूत्र पुनः सार्थक होता है—शब्द से तत्त्व, तत्त्व से बोध, बोध से विवेक और विवेक से आचरण। केवल श्लोक याद कर लेना ज्ञान की सम्पूर्णता नहीं; उसके आशय को समझना बोध है, उस बोध के आधार पर उचित-अनुचित का निर्णय करना विवेक है और उस निर्णय को जीवन में उतारना आचरण है। इसी प्रकार ऋषि से स्मृति, स्मृति से संस्कार, संस्कार से विवेक, विवेक से पुरुषार्थ, पुरुषार्थ से आत्मोन्नति और आत्मोन्नति से लोकहित की यात्रा उस जीवन-दृष्टि को व्यक्त करती है जिसमें परम्परा का अध्ययन अन्धस्वीकार नहीं बनता, संस्कार जड़ता नहीं बनते और आत्मोन्नति पलायन नहीं बनती, बल्कि ये सब मिलकर विवेकपूर्ण, उत्तरदायी और लोककल्याणकारी जीवन की तैयारी करते हैं। अन्ततः गीता 3.42 का मूल प्रश्न केवल यह नहीं है कि इन्द्रियों से मन श्रेष्ठ है, मन से बुद्धि श्रेष्ठ है और बुद्धि से आत्मा परे है; इसका साधनात्मक प्रश्न यह है कि मनुष्य अपनी जीवन-यात्रा में किस स्तर से संचालित हो रहा है। यदि वह केवल इन्द्रियाकर्षण से संचालित है, तो तत्काल सुख उसका निर्णय कर सकता है। यदि वह मन की इच्छाओं और आवेगों से संचालित है, तो उसकी दिशा बार-बार बदल सकती है। यदि वह बुद्धि का उपयोग करता है, तो वह परिणामों का परीक्षण कर सकता है। और यदि वह आत्मतत्त्व के बोध की दिशा में साधना करता है, तो वह अपनी मानसिक अवस्थाओं को ही अपना सम्पूर्ण स्वरूप मान लेने से मुक्त होने का प्रयास कर सकता है। यहाँ बुद्धि को नष्ट करना नहीं, उसे परिष्कृत करना है; मन को शत्रु मानना नहीं, उसे अनुशासित करना है; इन्द्रियों को काट देना नहीं, उन्हें विवेक के अधीन रखना है। आत्मबोध की साधना इन सबको उनके उचित स्थान पर स्थापित करने का प्रयत्न है। इस दृष्टि से दशरथ से राम तक की प्रतीकात्मक यात्रा बाहरी कथा से आगे बढ़कर आत्मनिरीक्षण का माध्यम बन सकती है—देह और इन्द्रियों से आरम्भ होकर मन की प्रवृत्तियों का परीक्षण, बुद्धि का परिष्कार, धर्ममय विवेक का उदय और कर्तव्यपूर्ण आचरण तक। अन्ततः इन्द्रियाँ अनुभव के द्वार हैं, मन अनुभवों की प्रतिक्रिया का क्षेत्र है, बुद्धि निर्णय की शक्ति है और आत्मतत्त्व उस समूची व्यवस्था से परे खोजा जाने वाला आध्यात्मिक सत्य है। जब इन्द्रियाँ संयमित हों, मन परिष्कृत हो, बुद्धि विवेकशील हो और कर्म धर्म के अनुरूप हो, तब मनुष्य की शक्तियाँ परस्पर संघर्ष करने के स्थान पर एक-दूसरे की सहायक बनती हैं। यही आत्मसंयम से आत्मबोध और आत्मबोध से लोकहित की ओर बढ़ने वाली साधना का व्यावहारिक संकेत है। सत्यं मार्गदर्शकं, विवेकः निर्देशकः, पुरुषार्थः साधनम्, आत्मोन्नतिः लक्ष्यं, लोकहितं च जीवनस्य विस्तारः।

जय श्री राधे कृष्णा 🌹 🙏
I have copied and pasted it so I can refer it again and again to deepen my knowledge.

Monday, October 19, 2026

The Cost of "Efficiency": What Are We Training Children to Miss? 🧠✨

 



The Cost of "Efficiency": What Are We Training Children to Miss?
🧠✨

When we look at early childhood education, we rarely question the tools we give our children. We teach them the 5 English vowel letters (A,E,I,O,U) and consider literacy achieved.

But if we zoom out and look at ancient linguistic and acoustic traditions—like the Sanskrit Solah Swar (16 vowels) mapped directly to the 16 petals of the Vishuddhi Chakra in the throat—a fascinating contrast emerges:

  • The Modern/English Model: Built for speed, industrial scale, and transactional communication. It compresses the vocal spectrum into 5 constricted graphemes.
  • The Ancient/Phonetic Model: Built as an acoustic technology. It treats the throat as an "antenna," utilizing the full 16-vowel spectrum to stimulate finer neural pathways, vagus nerve activity, and resonance with the broader universe.

Physically and energetically, our vocal tracts and nervous systems possess the capacity for the full spectrum. Yet, modern schooling trades acoustic richness for cognitive economy.

When we restrict a child to a simplified 5-vowel system, we optimize them for rapid text processing—but do we inadvertently narrow their inner antenna?

Are we educating for mere functional literacy, or are we missing out on the full biological and energetic potential of the human voice?

#Education #Linguistics #VishuddhiChakra #Consciousness #Neuroplasticity #SoundHealing #AncientWisdom #EarlyChildhoodEducation #Phonetics


Sunday, June 14, 2026

 



प्रणाम,
आज का प्रसंग,
ये केचिद्दुःखिता लोके सर्वे ते स्वसुखेच्छया।
ये केचित्सुखिता लोके सर्वे तेऽन्यसुखेच्छया॥ शास्त्रपिटक॥
इस संसारमें जो कोई भी अपने सुखकी इच्छासे कर्म करते हैं, वही दुखी हैं और जो कोई भी दूसरोंके सुखकी इच्छासे कर्म करते हैं, वे ही सुखी हैं।
सर्वे भवन्तु सुखिन, सर्वे संतु निरामया, सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चित दुःखभाग भवेत्। 🙏🙏🙏🙏
आस्था, विश्वास, सत्यनिष्ठ होकर उपरोक्त्त श्लोक भी बारम्बार बोल लें तो सुख अवश्य मिलता है। शब्दों की महिमा अपरंपार है।
करके देखें!
सदी का महासंदेश सत्य से प्रेम, प्रेम से कर्म करें।
प्रसंग प्रणाम से प्रणव तक सत्य की विजय यात्रा में भाग लें।
Look beyond imperfections
Be 'PRASANG' Be Joyous
रेणु वशिष्ठ
मेरी काया मेरी वेधशाला से
4.1.2026

Curiosity makes us wise!!!

 



Only the wise can think! Curiosity makes us wise as it leads to Learning ......
Knowledge economy v/s wisdom economy
Somebody had said we are living in the age of "knowledge economyHe listed five factors -- what he called '4-E's and 1-Q' -- as he laid out his road map for a sustainable society:
Education, Employability, Entrepreneurship, Efficiency and Quality
We at Prasang Vashistha Charitable Trust and Bakhal Preschool curriculum researchers Pvt Ltd say it’s the age of “Wisdom Economy”.
To know all about it join us at the III Symposium: The Teacher as An Awakener
‘Knowledge Economy v/s Wisdom Economy’
August 10, 2024
The general objective here is to tap the hidden potentials of the participants by making them aware of their subtle points to unleash the flow of dormant possibilities so that they can unfold the child’s potentials at three levels, Individual, National and Universal

साक्षरा: शब्द अगर उलटा लिखा तो राक्षसा: हो जाता है

 



साक्षरा: शब्द अगर उलटा लिखा तो राक्षसा: हो जाता है। लेकिन सरस: शब्द अगर उलटा लिखा तो भी सरस: ही रहता है । साक्षर या शिक्षित व्यक्ति भी तनाव में कुछ स्थितियों में एक राक्षस की तरह व्यवहार कर सकते हैं। लेकिन एक सज्जन (चाहे शिक्षित या अशिक्षित), किसी भी हालत में अपने अच्छे गुण नहीं छोड़ता हैं । इसीलिए सिर्फ साक्षर नहीं, सज्जन भी बनना चाहिए।
If (the word) "SakShara" (literate) is inverted, it becomes "RakShasa" (devil). (but) if (the word) "sarasa" (good) is inverted, it remains "sarasa". A "sakshara" (literate or educated person) can behave like a "rakshas" (a wicked person) in certain situations under stress if he is not able to control himself. But a "saras" (good person, cultured person, gentleman) whether educated or uneducated, will not leave his this property (of being good person) in any condition. Thus, it is advisable for us to be a sarasa person along with being SakShara.

दिव्यास्त्र तो बन रहे है परंतु बच्चों की दिव्यता का पोषण नहीं हो रहा?

 



शिव कृपा करो
शिव आज्ञा दो
श्रीवाग्नि प्रवाहित होने।
प्रणाम,
दिव्यास्त्र तो बन रहे है परंतु बच्चों की दिव्यता का पोषण नहीं हो रहा?
दिव्यता के पोषण हेतु शिक्षा नहीं विद्या देनी चाहिए। बच्चों को साक्षर नहीं सरस बनाना है।
ज्ञान का विज्ञान जाने बिना बच्चों की दिव्यता उजागर नहीं हो सकती। दिव्यता बुद्धि में नहीं विवेक के केंद्र बिंदु में होती है। सुनने, बोलने, लिखने, पढ़ने में बिंदु को प्रकाशित होना चाहिए।
बिंदु के केंद्र में पहुंचने के लिए केंद्रित होने की आवश्यकता है।
अनुशासन के बिना केंद्रित होना संभव नहीं। अनुशासन का अर्थ ही अपने अणु अणु पर शासन करना है। यदि बच्चे अपने केंद्र को नहीं थाम पाए तो उनकी दिव्यता व्यर्थ व्यय हो जाती है।
दिव्य होने के लिए सदी के महासंदेश सत्य से प्रेम, प्रेम से कर्म करें।
प्रसंग प्रणाम से प्रणव तक सत्य की विजय यात्रा में भाग लें।
Look beyond imperfections
Be 'PRASANG' Be Joyous
रेणु वशिष्ठ
मेरी काया मेरी वेधशाला से
9फरवरी 2026

Saturday, June 13, 2026

 



आदि श्रीशंकराचार्य जी के पिता श्रीशिवगुरु ग्राम में ही विद्यमान कात्यायनी देवी का नित्य पूजन करते थे।
स्वादिष्ट गोदुग्ध का भोग लगाने के अनन्तर अवशिष्ट दुग्ध पुत्र को देते थे, देवी का प्रसाद समझकर बालक ग्रहण करता था ।
एक दिन पिता को किसी आवश्यक कार्य से कुछ दिनों के लिए बाहर जाना पड़ा । उन्होंने पत्नी को पूजन तथा दुग्ध भोग लगाने की आज्ञा दी । माता जी अवशिष्ट प्रसाद बालक को देती थी । बीच में वह मासिक धर्म से युक्त हुई, तब बालक को बुलाकर भगवती का पूजन करने के लिए दुग्ध दिया ।
बालक ने देवी के मंदिर में जाकर भक्तिपूर्वक देवी को स्नान करवाकर माता द्वारा दिया हुआ दुग्ध जगदम्बा के आगे रखकर पीने की प्रार्थना की ।
दुग्ध को ज्यूँ का त्यूँ देखकर, 'अम्बा कुपित हो गई हैं इसीलिए ग्रहण नहीं करती' यह सोचकर बाल भाव से आचार्य रुदन करने लगे । इनके आगे पार्वती जी प्रकट हुई और स्वर्ण पात्रस्थ दुग्ध लेकर पीने लगी ।
पात्र को पूरा खाली होते हुए देखकर उन्होंने कहा-- "हे अम्ब ! क्या सब पी जाओगी ?, हमे नहीं दोगी ?" हठ करते हुए अब और रुदन करने लगे । तब बाल-वत्सला जगदम्बा ने बालक को गोद में लेकर दुलार करती हुई अपना स्तनपान कराने लगी । उस दुग्ध में ज्ञान, वैराग्य तथा काव्य धारा भरी थी । यह आचार्य की कुलदेवी थी ।
जगदम्बा के दाहिने स्तन से ज्ञान और वैराग्य की धारा तथा बाएं स्तन से काव्य धारा प्रवाहित हुई । इसी भाव को व्यक्त करते हुए आचार्यपाद ने "सौंदर्य लहरी" के ९७वें श्लोक में कहा है । इस ग्रँथ पर सौभाग्यवर्धिनी, अरुणामोदिनी,आनंदगिरीय तथा भास्कर राय की व्याख्याएं है ।~~
"हे अम्ब ! आपका यह द्रविड़ शिशु आपके स्तनपान के प्रभाव से ही ज्ञान-वैराग्य को प्राप्त करके काव्य रचना करने में सक्षम हुआ है ।"
भगवती के प्रकट होने पर भक्तिपूर्वक स्तुति करके पूजा समाप्त की । देवी मंदिर से निकलकर आचार्य अपनी माता के साथ घर पहुंचे । कुछ दिनों बाद पिता जब लौटकर आये तब बालक का तेज देखकर अति विस्मय को प्राप्त हुए ।
भगवती ने आकाशवाणी द्वारा कहा-- "आपका यह पुत्र साधारण बालक नहीं है, बल्कि स्वामी कार्तिक ही तुम्हारे पुत्ररूप में है, इसमें संदेह नहीं है । अथवा विष्णु ने ही बालक रूप धारण किया है या सत्यवती नंदन भगवान व्यास ही इस बालक के रूप में विद्यमान है ।" इस प्रकार देवी ने प्रशंसा की।