
शिव कृपा करो,
शिव आज्ञा दो,
शिवाग्नि प्रवाहित हो।
प्रणाम,
मनुष्य के भीतर जितनी ऊर्जा होती है, वह या तोबाहर की ओर बहती है या भीतर की ओर उतरती है। बाहर की ओर बहती है तो संसार बनाती है, महत्वाकांक्षाएँ बनाती है, इच्छाएँ बनाती है, भोग बनाती है।
यदि यम, नियम, आसान, प्राणायाम और प्रत्याहार द्वारा भीतर की ओर मुड़ती है तो वही ऊर्जा धारणा,ध्यान बन जाती है, अंततः समाधि बन जाती है, आत्मबोध का माध्यम बन जाती है।
समस्या यह नहीं है कि मनुष्य के पास ऊर्जा नहीं है। समस्या यह है कि जो ऊर्जा उसे भीतर ले जा सकती थी, वही अधिकांशतः इंद्रियसुखों, चिंताओं, प्रतिस्पर्धाओं, क्रोध, ईर्ष्या और वासनाओं में खर्च हो जाती है। जब तक मनुष्य को इसका बोध होता है, तब तक जीवन की डांवाडोल हो चुका होता है।
यही जीवन की सबसे बड़ी विडंबना है।
युवा अवस्था वह अवस्था है जब शरीर में बल, मन में उत्साह, संकल्प में तेज और प्राणों में प्रचुरता होती है। युवा मन को संसार भी उसी आकर्षित करता है। संसार का आकर्षण — "इस ऊर्जा को भोग में लगाता है।"
माया के भोग साधन जुटाने में स्वयं का बोध ही नहीं रह जाता।ऊर्जा क्षय होती रहती है। यदि ऊर्जा को भोग और बोध दोनों में बराबर बराबर लगाया जाए तो दोनों सध सकते हैं।
दोनों दिशाएँ एक साथ पूरी शक्ति से नहीं चल सकतीं। तीन चौथाई ऊर्जा भीतर और एक चौथाई ऊर्जा संसार में लगाई जाए तो शांतिमय, मंगलमय जीवन की कल्पना की जा सकती है। हम एक चौथाई ऊर्जा भीतर सहेजते हैं (जो प्राकृतिक रूप से होती ही है) और तीन चौथाई ऊर्जा संसार में छोड़ते हैं। ऊर्जा का बहाव शरीर में ठहरता नहीं , क्योंकि भीतर ठहराव नहीं, स्थिरता नहीं। चंचल ऊर्जा ब्रह्मांड से आप में प्रवाहित होती है और सीधी बाहर निकल जाती है आपके दस द्वारों से। संसार का पूरा रसास्वादन, इच्छाओं की तृप्ति , धन और प्रतिष्ठा अर्जित करने के लिए। सारा ईंधन जल जाता है और फिर निढाल होकर बैठे रहते हैं। भोग के साथ साथ बोध पर भी ऊर्जा लगती रहे तो वही आत्मबोध वृद्धावस्था का मनोरंजन बन जाता है।
युवावस्था में ऊर्जा का प्रवाह तीव्र गति से होता है, उसी ऊर्जा के प्रवाह से endocrine glands activate होती हैं, हार्मोन स्रावित होते हैं। शुरू में आरंभ में ऊर्जा के प्रवाह को हर बच्चा झेल नहीं पाता और कई प्रकार की शारीरिक , मानसिक परेशानियों का सामना करता है। जो परेशानियां नहीं होती हैं उसके ऊर्जा को ग्रहण करने की प्रक्रिया का हिस्सा होती हैं।जिसे परिजन बीमारी समझकर चिता का विषय बना लेते हैं। बहुत सा बेसिरपैर का ज्ञान दे दिया जाता है। प्राचीन गुरुकुलों में बालकों को केवल शास्त्र नहीं पढ़ाए जाते थे, बल्कि जीवन की दिशा दी जाती थी। अनुशासित किया जाता था। ताकि वे भीतर से परिपक्व होकर संसार में रहते हुए भी अपने केंद्र को न भूलें।
जिस भूमि में बीज समय पर बोया जाता है, वही वृक्ष बनती है। जो बीज सूखी भूमि पर बहुत देर से डाला जाए, उसके अंकुरित होने की संभावना कम हो जाती है।
यही कारण है कि ब्रह्मचर्य को महत्व दिया जाना चाहिए।
ब्रह्मचर्य का अर्थ केवल शारीरिक संयम नहीं है। उसका वास्तविक अर्थ है — अपनी जीवनशक्ति का संरक्षण और उसका उच्चतर दिशा में रूपांतरण करना। ब्रह्मचर्य वह कला है जिसमें मनुष्य अपनी बिखरी हुई ऊर्जा को समेटता है, उसे एकाग्र करता है और उसे चेतना के उत्कर्ष में लगाता है।जिस प्रकार सूर्य की बिखरी हुई किरणें सामान्य गर्मी देती हैं, परंतु वही किरणें लेंस के माध्यम से एक बिंदु पर केंद्रित हो जाएँ तो अग्नि प्रज्वलित कर देती हैं, उसी प्रकार बिखरी हुई जीवनशक्ति केवल सामान्य जीवन जीती है, जबकि एकत्रित जीवनशक्ति आत्मबोध का द्वार खोल सकती है।
यह सत्य है कि इतिहास में कुछ ऐसे महापुरुष हुए हैं जिन्होंने सामान्य नियमों से भिन्न मार्ग अपनाकर भी उच्चतम आध्यात्मिक अवस्थाएँ प्राप्त कीं। किंतु अपवाद कभी नियम नहीं होते। उन महापुरुषों के पास जन्मजात या अर्जित रूप से प्राणशक्ति का इतना विशाल भंडार था कि वे सामान्य सीमाओं से परे जा सके। साधारण मानव को अपवादों की नहीं, सिद्धांतों की चिंता करनी चाहिए।जो व्यक्ति अपनी ऊर्जा को निरंतर इच्छाओं में खोता रहता है, वह ध्यान में स्थिर नहीं हो सकता। और जो अपनी ऊर्जा को सहेजना सीख लेता है, उसके भीतर स्वाभाविक रूप से मौन, एकाग्रता और अंतर्दृष्टि का जन्म होने लगता है।
सत्य का बीज जितना जल्दी बोया जाए, उतना अच्छा है। किशोरावस्था में बोया जाए तो वह दिशा बन जाता है। युवावस्था में बोया जाए तो वह साधना बन जाता है। और यदि वृद्धावस्था में बोया जाए तो भी उसका मूल्य है, पर तब वह संघर्ष अधिक और संभावना अपेक्षाकृत कम लेकर आता है।इसलिए यदि जीवन में कभी आत्मबोध की आकांक्षा जागे, तो उसे भविष्य पर मत टालिए। अध्यात्म उस दिन से आरंभ होता है जिस दिन मनुष्य यह समझ लेता है कि उसकी सबसे बड़ी पूँजी समय नहीं, धन नहीं, बल्कि उसकी जीवनशक्ति है।
जिसने अपनी ऊर्जा को पहचान लिया, उसने साधना का पहला द्वार खोल लिया।और जिसने अपनी ऊर्जा को संभाल लिया, उसके लिए आत्मा तक पहुँचने का मार्ग दूर नहीं रह जाता। आत्म बोध से आत्मशक्ति मिलती है, "मैं हूं ना " भीतर से आवाज गूंजती रहती है।
आप कुछ करें या ना करें , आत्मशबोध, आत्मशक्ति हेतु सदी के महासंदेश सत्य से प्रेम, प्रेम से कर्म करें।
प्रसंग प्रणाम से प्रणव तक सत्य की विजय यात्रा में भाग लें।
Look beyond imperfections
Be 'PRASANG' Be Joyous
रेणु वशिष्ठ
#imbibevalues #buildcharacter #buildnation #nochildleftout #nochildleftbehind
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