Be ‘PRASANG’ (Positive, Responsible, Ambitious, Supportive, Abreast, Noble,Generous) Be JOYOUS Emotional Well Being movement to lead a happy, joyful life.never feel guilt about learning and wisdom. Believe_ This day is not a mistake, you have made all the right choices, you know more than you knew this day. Cease_ guilt, mockery of sadness in self, burdening yourself, placing blame on others.
Tuesday, November 3, 2026
बढ़ विजय की ओर!!!
आज का प्रसंग, सभी स्कूल्स बच्चे के पूर्ण विकास की बात करते हैं।
आओ साथ मिलके चले
साथ मिलकर कदमों का सफर: हौसलों की उड़ान
यह बात 19 अगस्त 2006 की है। 'आनंदपुर' नाम के एक खूबसूरत और हरे-भरे गाँव में कुछ नन्हें दोस्त रहते थे। उस दिन गाँव के बच्चों ने मिलकर एक लंबी और रोमांचक ट्रैकिंग पर जाने का फैसला किया।
रास्ता लंबा और अनजान था, इसलिए कुछ बच्चे मन ही मन थोड़े डरे हुए थे। तभी उनमें से एक समझदार बच्चे ने प्यार से सबका हौसला बढ़ाया और गुनगुनाया—
"आओ साथ मिलके चले इन हसीन राहों में..."
बस, फिर क्या था! सब बच्चों ने एक-दूसरे का हाथ थाम लिया। जब वे सब साथ चले, तो रास्ते की बड़ी-बड़ी मुश्किलें भी अपने आप कम होने लगीं। हर एक कदम के साथ उनका आत्मविश्वास और भाईचारा मजबूत होता चला गया।
चलते-चलते अचानक रास्ते में झाड़ियों के बीच से एक खतरनाक रुकावट आई—एक तरफ से हवा का तेज झोंका और कंकड़-पत्थरों के बीच एक बड़ी बाधा ने उन्हें डराने की कोशिश की। लेकिन बच्चों के मन में पक्का इरादा था कि वे हर मुश्किल का डटकर सामना करेंगे। उन्होंने तय किया कि जो भी डर या बाधा उन्हें डराएगी, वे अपने मजबूत हौसलों से उसका डटकर मुकाबला करेंगे और हर बाधा को दूर भगा देंगे।
सबने मिलकर एक-दूसरे का हाथ मजबूती से पकड़ा और कदम-दर-कदम आगे बढ़ते गए। उस दिन बच्चों ने यह सीख लिया कि जब इरादे पक्के हों और अपनों का साथ हो, तो दुनिया की कोई भी ताकत आपको आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती!
कदम से कदम को मिला के चलो
कदमों का जादुई सफर और एकता की ताकत
एक सुंदर और हरे-भरे गाँव में 'मधुबन' नाम का एक प्यारा सा स्कूल था। वहाँ कई सारे नन्हे-मुन्ने बच्चे पढ़ते थे। उन बच्चों में एक बात बहुत खास थी—वे कभी अकेले नहीं चलते थे। वे हमेशा एक-दूसरे का हाथ थामकर, "कदम से कदम को मिला के चलो" गाते हुए स्कूल आते और खेलते थे।
एक दिन स्कूल के खेल के मैदान में एक मजेदार प्रतियोगिता हुई। टीचर ने बच्चों से कहा, "आज तुम सबको मिलकर एक लंबी छलांग लगानी है और मैदान के दूसरे छोर तक पहुँचना है।"
शुरुआत में सब बच्चे अलग-अलग भागने लगे, जिससे वे बार-बार लड़खड़ा कर गिर जाते। तब एक समझदार बच्ची आगे आई और बोली, "ऐसे अकेले भागने से हम थक जाएँगे और जीत नहीं पाएंगे। हमें तो मिलकर चलना होगा!"
फिर क्या था! सब बच्चों ने एक-दूसरे के कंधे पर हाथ रखा, सभी को गले से लगा के चलो की तर्ज पर आपस में प्यार से जुड़े और एक साथ लाइन बनाई।
अब हर एक कदम उनकी चाहत बन गया था। जब वे सब एक साथ तालमेल बिठाकर आगे बढ़ने लगे, तो वह कदम-दर-कदम मिलकर एक बहुत बड़ी ताकत बन गया। किसी को भी अब अकेलेपन या हार का डर नहीं था, क्योंकि वे सब एक साथ, कदम दर कदम आगे बढ़ रहे थे।
उन्होंने हँसते-गाते हुए वह खेल भी जीत लिया और यह सीख लिया कि जब हम सब मिलकर, एक-दूसरे का साथ देते हुए आगे बढ़ते हैं, तो कोई भी मुश्किल बड़ी नहीं होती!
चंदा के चाक पे
चंदा का चाक और सपनों की दुनिया
एक सुनहरी और ठंडी रात थी। आसमान में चमकते चाँद को देखकर कुछ नन्हें बच्चों के मन में एक अनोखा विचार आया। उन्होंने एक-दूसरे से कहा, "चलो बच्चों, आज हम सिर्फ ज़मीन पर नहीं, बल्कि सीधे चंदा के चाक पर चलेंगे और वहाँ अपनी एक सपनों की नई दुनिया बसाएंगे!"
सारे बच्चे खुशी से झूमते हुए "चलो-चलो, जल्दी चलो!" कहते हुए चल पड़े। वे अपने साथ धरती की सोंधी-सोंधी माटी और बादलों का थोड़ा सा ठंडा पानी भी साथ ले गए।
जब वे चंदा के पास पहुँचे, तो उन्होंने उस अंतरिक्ष की माटी में पानी मिलाया। फिर क्या था? चिकनी-चिकनी मिट्टी पर बच्चे खुशी से कूदने-फांदने लगे और अपने नन्हे हाथों से उस माटी को गूँथ-गूँथकर एकदम नरम बना दिया। उन्होंने आसमान के सात रंगों वाले इंद्रधनुष का धागा निकाला और चंदा के चाक को गोल-गोल घुमाने लगे।
चाक के घूमते ही उन्होंने मिट्टी से एक सुंदर सी सुराही की गर्दन और प्यारे-प्यारे बर्तन बनाने शुरू कर दिए। उन पर आसमान के टिमटिमाते तारों के झिलमिल रंग सजाए गए। बच्चों की हँसी इतनी प्यारी थी कि ऐसा लगा मानो वे बर्तन भी बच्चों को देखकर हंस रहे हों! इसके बाद, उन्होंने सूरज की सुनहरी भट्टी में उन सबकाे पकाया ताकि वे मजबूत हो सकें।
चंदा के इस बड़े से चाक पर कल्पना की एक अद्भुत अल्पना रच दी गई थी।
वहाँ खड़े वे बच्चे बहुत प्यारे और न्यारे थे—वे सब रेणु के राजदुलारे थे। वे भले ही उम्र में नाजुक और छोटे थे, पर उनके इरादे पक्के थे। उन्हें खूब प्यार से गढ़ा और पकाया गया था, फिर भी वे थोड़े कच्चे थे... और हों भी क्यों न, आख़िर वे प्यारे-प्यारे जो बच्चे थे!
वे पक्के, कच्चे और सच्चे बच्चे, अपनी बनाई इस सुंदर दुनिया को आसमान की आखिरी छोर यानी क्षितिज की रेखा पर सजाकर बहुत खुश हुए।
और इस तरह, चंदा के चाक और कल्पना की अल्पना में बच्चों ने मिलकर एक सचमुच की सपनों जैसी दुनिया रचा ली!
नटखट तितली और फूलों की महक
बाल-मन की मासूमियत, चंचलता और प्रकृति के आंचल में दौड़ते-भागते बच्चों की एक बहुत ही सुंदर और प्यारी कहानी है:
तितली और चंचल कदम
एक सुनहरी धूप वाली सुबह थी। चारों ओर खिले हुए सुंदर फूलों पर रंग-बिरंगे फूलों की महक छाई थी। तभी वहाँ एक बहुत ही प्यारी, रंग-बिरंगी और सुनहरी रूप वाली तितली उड़ती हुई आई। उसके पंखों के रंग ऐसे थे कि जो भी उसे देखता, उसका मन खुशी से झूम उठता।
दो छोटे-छोटे बच्चे, जिनकी आँखें उत्सुकता से चमक रही थीं, उस तितली को देखकर चहक उठे— "अरे देखो! तितली! आओ-आओ, तितली पकड़ें!"
वे दोनों हँसते-भागते उसके पीछे हो लिए। तितली भी बड़ी नटखट थी। वह उन्हें ऐसा चकमा देती कि जैसे ही बच्चे दबे पाँव धीरे-धीरे पीछे पहुँचकर अपने नन्हे हाथ उसके पंख पकड़ने के लिए बढ़ाते, तितली "फुर्र" से इधर से निकलकर उधर खिसक जाती!
कभी वह इस क्यारी के फूल पर बैठती, तो कभी उस क्यारी पर इतराती हुई फुदक जाती। उसने बच्चों को इस क्यारी से उस क्यारी तक ऐसी उछल-कूद कराई कि वे थकने के बावजूद मजे से उसके पीछे-पीछे मंडराते रहे। तितली ने तो उन बच्चों को बिल्कुल मस्त ही कर दिया था!
भागते-भागते तितली के पीछे-पीछे वे बच्चे गाँव या मोहल्ले के एक छोटे से जंगल और बाग़ की तरफ पहुँच गए। वहाँ पहुँचते ही पीछे मंदिर और मस्जिद छूट गए, और रास्ते में उन्हें नए-नए प्यारे दोस्त मिल गए। टर्र-टर्र करता हुआ एक मेंढक आ गया, कुट-कुट करती गिलहरी फुदक उड़ी, एक खरगोश ने लंबी छलांग लगाई, तो कछुआ मद्धम-मद्धम अपनी चाल से चलने लगा। केंचुआ भी धीरे-धीरे रेंगता हुआ आ गया और अपना छोटा सा घर साथ लिए हुए एक स्नेल (घोंघा) भी वहाँ आ निकला।
लेकिन बच्चों का मन तो इन सब पर आया ही नहीं! उन्हें तो बस अपनी वही प्यारी तितली भा रही थी। वे चिल्लाए— "तितली तितली! कोई हमको नहीं भाया, हमारा मन तो बस तितली पर ही आया है!"
तितली के संग-संग वे बच्चे भी खूब दौड़े-भागे और हर फूल पर उसके साथ मंडराते रहे। आखिर में, दौड़ते-दौड़ते वे बुरी तरह थक गए। भौंचक्के होकर उन्होंने देखा कि तितली तो हाथ आई ही नहीं, और वह उड़कर आसमान में दूर निकल गई।
तितली भले ही हाथ नहीं आई, लेकिन जब वे बच्चे अपने घर लौटे, तो उनके छोटे-छोटे नन्हे मन और कपड़े फूलों की भीनी-भीनी खुशबू और प्रकृति की अनमोल सुगंध से महक रहे थे। वे खुशी से बोल उठे— "अरे वाह! तितली हाथ न सही, पर हम फूलों की प्यारी सुगंध तो ज़रूर ले आए!"
Tuesday, October 27, 2026
इन्द्रियों से आत्मतत्त्व तक
इन्द्रियों से आत्मतत्त्व तक एक दार्शनिक अभिलेख








