हमारे सिर के अंदर मस्तिष्क दो हिस्सों (Left और Right Hemispheres) में बँटा होता है। कॉर्पस कैलोसम इन दोनों के बीच एक 'सुपर-हाईवे' या पुल की तरह है। इसका काम दोनों तरफ की जानकारियों को एक-दूसरे तक पहुँचाना है।
बायाँ हिस्सा : यह एक 'मैनेजर' की तरह है। इसे आंकड़े, भाषा, गणित, तर्क (Logic) और चीज़ों को क्रम में रखना पसंद है।
दायाँ हिस्सा : यह एक 'कलाकार' की तरह है। इसे कल्पना, संगीत, भावनाएं, और बड़ी तस्वीर देखना पसंद है।
आज के समय में हमारी पढ़ाई का ज़्यादातर ज़ोर 'बाएँ मस्तिष्क' पर होता है—जैसे रटना, परीक्षा पास करना और लॉजिक लगाना। लेख यह कहता है कि हम अक्सर इन दोनों हिस्सों को अलग-अलग इस्तेमाल करते हैं, जिससे हमारी सोच अधूरी रह जाती है।
जब ये दोनों हिस्से एक साथ काम करते हैं, तो क्या होता है?
लॉजिक + विज़न = पूर्ण जागरूकता
अगर आपके पास सिर्फ लॉजिक (बायाँ हिस्सा) है, तो आप मशीन की तरह काम करेंगे। आपके पास जानकारी तो होगी, लेकिन उसका उद्देश्य नहीं पता होगा।
अगर आपके पास सिर्फ विज़न/अंतर्ज्ञान (दायाँ हिस्सा) है, तो आपके पास बड़े सपने तो होंगे, लेकिन उन्हें सच करने का कोई प्लान नहीं होगा।
जब ये मिलते हैं,गहरी समझ:आप सिर्फ यह नहीं जानते कि "क्या" हो रहा है, बल्कि यह भी समझते हैं कि "क्यों" और "कैसे" हो रहा है।
समस्या का समाधान: आप तर्क से डेटा देखते हैं और कल्पना से एक नया रास्ता खोजते हैं।
संतुलन:प्राचीन सभ्यताओं (जैसे योग या दर्शन में) इसे ही 'जागरूकता की उच्च स्थिति' कहा गया है। जहाँ ज्ञान (Knowledge) और समझ (Wisdom) एक हो जाते हैं।
मनुष्य केवल एक 'कैलकुलेटर' या सिर्फ एक 'सपना देखने वाला' नहीं है। हमारी असली ताकत तब निखरती है जब हम तर्क (Logic) को भावना और कल्पना (Intuition)के साथ जोड़ देते हैं। यह "विपरीत चीज़ों का मिलन" ही हमें एक साधारण मनुष्य से एक जागरूक मनुष्य बनाता है।
इसी विषय से संबंधित उपनिषदों में वचन मिलते हैं।
अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते।
ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायां रताः ॥९॥
(ईसावास्योपनिषद)
जो अविद्या की उपासना की उपासना करते हैं,वे अंधेरे में जाते हैं।जो विद्या की उपासना करते हैं,वे घोर अंधेरे में जाते हैं। ।
जो केवल सांसारिक कर्म/अविद्या (भौतिकता) में लगे हैं, वे अंधकार में जाते हैं,(अनुभव तो करते हैं लेकिन कार्य कारण परिणाम को नहीं जानते हैं)।जो केवल विद्या (सैद्धांतिक ज्ञान/अहंकार) में रमे हैं, वे उससे भी अधिक गहरे अंधकार में जाते हैं,(जो कार्य कारण और परिणाम को तो जानते हैं लेकिन अनुभव और अनूभूति जन्य ज्ञान से रहित होते हैं)।
अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽसम्भूतिमुपासते।
ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्यां रताः ॥१२॥
(ईसावास्योपनिषद)
अर्थ: जो अव्यक्त प्रकृति (असम्भूति) की उपासना करते हैं, वे घोर अंधकार में जाते हैं। जो कार्य-ब्रह्म (सम्भूति - भौतिक सृष्टि) में ही रमे रहते हैं, वे और भी अधिक घोर अंधकार में प्रवेश करते हैं।
योग में इसीलिए संतुलन को बहुत महत्व दिया गया है। भैरव तंत्र सूत्र में शिव जी कहते हैं कि दो विपरीत के मध्य सत्य छिपा होता है। जिसे जान लेने से ज्ञान होता है। इसीलिए संध्या वंदन की विधियां ऋषियों ने बताईं थीं। संध्या का अर्थ है संधिकाल, जहां रात्रि जा रही है दिवस आ रहा है उसके ठीक मध्य में सूर्योदय कालीन संध्या।दिवस जा रहा है रात्रि आ रही है उसके ठीक मध्य में सूर्यास्त कालीन संध्या।जो दो विपरीत के मध्य सत्य को देख लेता है वह प्रज्ञावान हो जाता है।
किसी विषय को केवल शब्दों से नहीं समझा जा सकता है। उसके लिए भावार्थ भी समझना होता है।साथ ही उसका उद्देश्य क्या है? निहितार्थ भी समझना होता है।तब कहीं कोई विषय समझ में आता है।
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