Sunday, June 14, 2026

 



प्रणाम,
आज का प्रसंग,
ये केचिद्दुःखिता लोके सर्वे ते स्वसुखेच्छया।
ये केचित्सुखिता लोके सर्वे तेऽन्यसुखेच्छया॥ शास्त्रपिटक॥
इस संसारमें जो कोई भी अपने सुखकी इच्छासे कर्म करते हैं, वही दुखी हैं और जो कोई भी दूसरोंके सुखकी इच्छासे कर्म करते हैं, वे ही सुखी हैं।
सर्वे भवन्तु सुखिन, सर्वे संतु निरामया, सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चित दुःखभाग भवेत्। 🙏🙏🙏🙏
आस्था, विश्वास, सत्यनिष्ठ होकर उपरोक्त्त श्लोक भी बारम्बार बोल लें तो सुख अवश्य मिलता है। शब्दों की महिमा अपरंपार है।
करके देखें!
सदी का महासंदेश सत्य से प्रेम, प्रेम से कर्म करें।
प्रसंग प्रणाम से प्रणव तक सत्य की विजय यात्रा में भाग लें।
Look beyond imperfections
Be 'PRASANG' Be Joyous
रेणु वशिष्ठ
मेरी काया मेरी वेधशाला से
4.1.2026

Curiosity makes us wise!!!

 



Only the wise can think! Curiosity makes us wise as it leads to Learning ......
Knowledge economy v/s wisdom economy
Somebody had said we are living in the age of "knowledge economyHe listed five factors -- what he called '4-E's and 1-Q' -- as he laid out his road map for a sustainable society:
Education, Employability, Entrepreneurship, Efficiency and Quality
We at Prasang Vashistha Charitable Trust and Bakhal Preschool curriculum researchers Pvt Ltd say it’s the age of “Wisdom Economy”.
To know all about it join us at the III Symposium: The Teacher as An Awakener
‘Knowledge Economy v/s Wisdom Economy’
August 10, 2024
The general objective here is to tap the hidden potentials of the participants by making them aware of their subtle points to unleash the flow of dormant possibilities so that they can unfold the child’s potentials at three levels, Individual, National and Universal

साक्षरा: शब्द अगर उलटा लिखा तो राक्षसा: हो जाता है

 



साक्षरा: शब्द अगर उलटा लिखा तो राक्षसा: हो जाता है। लेकिन सरस: शब्द अगर उलटा लिखा तो भी सरस: ही रहता है । साक्षर या शिक्षित व्यक्ति भी तनाव में कुछ स्थितियों में एक राक्षस की तरह व्यवहार कर सकते हैं। लेकिन एक सज्जन (चाहे शिक्षित या अशिक्षित), किसी भी हालत में अपने अच्छे गुण नहीं छोड़ता हैं । इसीलिए सिर्फ साक्षर नहीं, सज्जन भी बनना चाहिए।
If (the word) "SakShara" (literate) is inverted, it becomes "RakShasa" (devil). (but) if (the word) "sarasa" (good) is inverted, it remains "sarasa". A "sakshara" (literate or educated person) can behave like a "rakshas" (a wicked person) in certain situations under stress if he is not able to control himself. But a "saras" (good person, cultured person, gentleman) whether educated or uneducated, will not leave his this property (of being good person) in any condition. Thus, it is advisable for us to be a sarasa person along with being SakShara.

दिव्यास्त्र तो बन रहे है परंतु बच्चों की दिव्यता का पोषण नहीं हो रहा?

 



शिव कृपा करो
शिव आज्ञा दो
श्रीवाग्नि प्रवाहित होने।
प्रणाम,
दिव्यास्त्र तो बन रहे है परंतु बच्चों की दिव्यता का पोषण नहीं हो रहा?
दिव्यता के पोषण हेतु शिक्षा नहीं विद्या देनी चाहिए। बच्चों को साक्षर नहीं सरस बनाना है।
ज्ञान का विज्ञान जाने बिना बच्चों की दिव्यता उजागर नहीं हो सकती। दिव्यता बुद्धि में नहीं विवेक के केंद्र बिंदु में होती है। सुनने, बोलने, लिखने, पढ़ने में बिंदु को प्रकाशित होना चाहिए।
बिंदु के केंद्र में पहुंचने के लिए केंद्रित होने की आवश्यकता है।
अनुशासन के बिना केंद्रित होना संभव नहीं। अनुशासन का अर्थ ही अपने अणु अणु पर शासन करना है। यदि बच्चे अपने केंद्र को नहीं थाम पाए तो उनकी दिव्यता व्यर्थ व्यय हो जाती है।
दिव्य होने के लिए सदी के महासंदेश सत्य से प्रेम, प्रेम से कर्म करें।
प्रसंग प्रणाम से प्रणव तक सत्य की विजय यात्रा में भाग लें।
Look beyond imperfections
Be 'PRASANG' Be Joyous
रेणु वशिष्ठ
मेरी काया मेरी वेधशाला से
9फरवरी 2026

Saturday, June 13, 2026

 



आदि श्रीशंकराचार्य जी के पिता श्रीशिवगुरु ग्राम में ही विद्यमान कात्यायनी देवी का नित्य पूजन करते थे।
स्वादिष्ट गोदुग्ध का भोग लगाने के अनन्तर अवशिष्ट दुग्ध पुत्र को देते थे, देवी का प्रसाद समझकर बालक ग्रहण करता था ।
एक दिन पिता को किसी आवश्यक कार्य से कुछ दिनों के लिए बाहर जाना पड़ा । उन्होंने पत्नी को पूजन तथा दुग्ध भोग लगाने की आज्ञा दी । माता जी अवशिष्ट प्रसाद बालक को देती थी । बीच में वह मासिक धर्म से युक्त हुई, तब बालक को बुलाकर भगवती का पूजन करने के लिए दुग्ध दिया ।
बालक ने देवी के मंदिर में जाकर भक्तिपूर्वक देवी को स्नान करवाकर माता द्वारा दिया हुआ दुग्ध जगदम्बा के आगे रखकर पीने की प्रार्थना की ।
दुग्ध को ज्यूँ का त्यूँ देखकर, 'अम्बा कुपित हो गई हैं इसीलिए ग्रहण नहीं करती' यह सोचकर बाल भाव से आचार्य रुदन करने लगे । इनके आगे पार्वती जी प्रकट हुई और स्वर्ण पात्रस्थ दुग्ध लेकर पीने लगी ।
पात्र को पूरा खाली होते हुए देखकर उन्होंने कहा-- "हे अम्ब ! क्या सब पी जाओगी ?, हमे नहीं दोगी ?" हठ करते हुए अब और रुदन करने लगे । तब बाल-वत्सला जगदम्बा ने बालक को गोद में लेकर दुलार करती हुई अपना स्तनपान कराने लगी । उस दुग्ध में ज्ञान, वैराग्य तथा काव्य धारा भरी थी । यह आचार्य की कुलदेवी थी ।
जगदम्बा के दाहिने स्तन से ज्ञान और वैराग्य की धारा तथा बाएं स्तन से काव्य धारा प्रवाहित हुई । इसी भाव को व्यक्त करते हुए आचार्यपाद ने "सौंदर्य लहरी" के ९७वें श्लोक में कहा है । इस ग्रँथ पर सौभाग्यवर्धिनी, अरुणामोदिनी,आनंदगिरीय तथा भास्कर राय की व्याख्याएं है ।~~
"हे अम्ब ! आपका यह द्रविड़ शिशु आपके स्तनपान के प्रभाव से ही ज्ञान-वैराग्य को प्राप्त करके काव्य रचना करने में सक्षम हुआ है ।"
भगवती के प्रकट होने पर भक्तिपूर्वक स्तुति करके पूजा समाप्त की । देवी मंदिर से निकलकर आचार्य अपनी माता के साथ घर पहुंचे । कुछ दिनों बाद पिता जब लौटकर आये तब बालक का तेज देखकर अति विस्मय को प्राप्त हुए ।
भगवती ने आकाशवाणी द्वारा कहा-- "आपका यह पुत्र साधारण बालक नहीं है, बल्कि स्वामी कार्तिक ही तुम्हारे पुत्ररूप में है, इसमें संदेह नहीं है । अथवा विष्णु ने ही बालक रूप धारण किया है या सत्यवती नंदन भगवान व्यास ही इस बालक के रूप में विद्यमान है ।" इस प्रकार देवी ने प्रशंसा की।

 



शिव कृपा करो,

शिव आज्ञा दो,
शिवाग्नि प्रवाहित हो,
प्रणाम ॐ
स्कूलों में शिक्षा दी जाती है, विद्या तो माता पिता ही अपने सत्कर्म से दे सकते हैं।
वाहन बनाना, चलाना,हवाई जहाज बनाना, उड़ाना सब कुछ विद्यालयों, विश्वविद्यालयों में सिखाया जा रहा है परंतु जीवन गाड़ी को चलाने वाली आत्मा को पोषित करने के लिए माता पिता ही प्रथम शिक्षक/गुरु हैं और परिवार पहली पाठशाला।
प्रश्न उठता है, आजकल के बच्चे सुनते नहीं?
सही बात है, इस सही बात को सही कैसे किया जाए?
सदी का महासंदेश यही कहता है सत्य से प्रेम, प्रेम से कर्म करें।
प्रसंग प्रणाम से प्रणव तक सत्य की विजय यात्रा में भाग लें।
Look beyond imperfections
Be 'PRASANG' Be Joyous
रेणु वशिष्ठ
मेरी काया मेरी वेधशाला से
Prasang Vashistha Charitable Trust एवं Bakhal Pre School Curriculum Researchers Pvt. Ltd. कटिबद्ध है चरित्र निर्माण से राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान देने हेतु।
आप भी सहयात्री बने।

 विद्वत्वं दक्षता शीलं सङ्क्रान्तिरनुशीलनम् ।

शिक्षकस्य गुणाः सप्त सचेतस्त्वं प्रसन्नता ।
शक्षक के सप्त गुण होते हैँ । यह है – विद्वता (knowledge), शिष्य के ग्रहणशक्ति के अनुसार शिक्षा देने के दक्षता (teaching skill), उत्तम चरित्र (integrity), अपने मन के भाव (विचार) को शिष्य के मन में प्रवेश कराने की योग्यता (communication skill), सब विषय में सचेतनता (carefulness), तथा प्रसन्नता (pleasant personality)

 



प्राचीन भारतीय शिक्षा में मेधा शक्ति बढ़ाने के लिए ध्वनि विज्ञान का सहारा लिया जाता था। मंत्र की शक्ति तंत्र (शरीर, मस्तिष्क) पर सुप्रभाव डालती थीं। अक्षर और शब्द ब्रह्म एक पूर्ण विज्ञान हैं, हावर्ड और टाइम मैगजीन की ट्रिक से कहीं बेहतर। आधुनिक विज्ञान अधूरा ज्ञान लिए अज्ञानता की ओर बढ़ रहा है। प्राचीन भारतीय ज्ञान पूर्ण विज्ञान है। मेधा शक्ति बढ़ाने हेतु छोटा सा प्रयोग करके देखें रात को सोते समय तीन बार शिव शिव शिव बोलें और सुबह जब उठें तो तीन बार नारायण नारायण नारायण बोले।

करके देखें।
क्या?
सदी के महासंदेश सत्य से प्रेम, प्रेम से कर्म करें।
प्रसंग प्रणाम से प्रणव तक सत्य की विजय यात्रा में भाग लें।
हावर्ड और टाइम मैगजीन की ट्रिक आपके mind को ट्रेन करेगी जबकि प्राचीन भारतीय क्रियाएं आपके माइंड को expand करेगा।
Train not, Expand the mind

 



"A human being psychologically is the whole of mankind. He not only represents it but he is the whole of the human species. He is essentially the whole psyche of mankind. On this actuality various cultures have imposed the illusion that each human being is different. In this illusion mankind has been caught for centuries, and this illusion has become a reality. If one observes closely the whole psychological structure of oneself, one will find that as one suffers, so all mankind suffers in various degrees. If you are lonely, the whole humankind knows this loneliness. Agony, jealousy, envy, and fear are known to all. So psychologically, inwardly, one is like another human being. There may be differences physically, biologically. One is tall or short and so on, but basically one is the representative of all mankind.

So psychologically you are the world; you are responsible for the whole of mankind, not for yourself as a separate human being, which is a psychological illusion… If one grasps the full significance of the fact that one is psychologically the world, then responsibility becomes overpowering love."
—Krishnamurti

 




जब शिक्षा केवल किताबों के पन्नों में सिमट जाती है, तो वह दिमाग को भरती है, लेकिन आत्मा को खाली छोड़ देती है। सूचनाओं का बोझ बढ़ता है, पर विचार और संवेदना सिकुड़ने लगते हैं। ऐसे समय में कक्षा केवल एक औपचारिकता बन जाती है—जहाँ उपस्थिति दर्ज होती है, पर जागृति नहीं होती। और यहीं से शुरू होती है एक शिक्षक की असली परीक्षा—वह तय करता है कि वह पाठ्यक्रम का प्रहरी बनेगा या परिवर्तन का प्रणेता।
यही वह बिंदु है जहाँ शिक्षक का रूप साधारण से असाधारण हो जाता है—जहाँ वह अपने भीतर छिपे “हनुमान” को पहचानता है। वह हनुमान, जो अपनी शक्ति से अनजान रहता है, जब तक उसे उसका बोध न कराया जाए। ठीक वैसे ही, एक शिक्षक भी अक्सर अपनी ही भूमिका की विराटता को कम आंकता है। लेकिन जैसे ही उसे अपने प्रभाव, अपनी जिम्मेदारी और अपनी क्षमता का अहसास होता है, वह केवल पढ़ाने वाला नहीं रहता—वह संजीवनी लाने वाला बन जाता है।
समस्याएँ हर युग में रही हैं—संसाधनों की कमी, व्यवस्थागत दबाव, समय की पाबंदियाँ—पर इन सबसे बड़ा संकट तब पैदा होता है जब शिक्षक अपने भीतर के उस हनुमान को सोए रहने देता है। क्योंकि असली बाधा बाहर नहीं, भीतर होती है। जब शिक्षक खुद को सीमित मान लेता है, तभी शिक्षा सीमित हो जाती है।
एक जाग्रत शिक्षक हनुमान की तरह ही कार्य करता है—वह अपने विद्यार्थियों के लिए असंभव को संभव बनाने की जिद रखता है। वह हर बच्चे में संभावनाओं का पर्वत देखता है और खुद वह शक्ति बनता है जो उस पर्वत को उठा सके। वह बच्चों के भीतर आत्मविश्वास की संजीवनी भरता है, उनके भय को दूर करता है, और उन्हें यह विश्वास दिलाता है कि वे केवल अंक लाने के लिए नहीं, बल्कि जीवन गढ़ने के लिए यहाँ हैं।
वह आदेश नहीं देता, प्रेरित करता है। वह डर नहीं पैदा करता, साहस जगाता है। वह केवल उत्तर नहीं देता, प्रश्न करने की आग पैदा करता है। यही वह क्षण होता है जब कक्षा एक कमरा नहीं रहती, वह एक कर्मभूमि बन जाती है—जहाँ शिक्षक और छात्र मिलकर सीखने का एक जीवंत संसार रचते हैं।
आज आवश्यकता इस बात की नहीं है कि हम शिक्षा की कमियों पर विलाप करें, बल्कि इस बात की है कि हम अपने भीतर झाँकें और उस शक्ति को पहचानें, जो हर शिक्षक में निहित है। एक शिक्षक जब अपने “हनुमान स्वरूप” को पहचान लेता है, तो वह किसी नीति, किसी संसाधन, किसी व्यवस्था का मोहताज नहीं रहता। वह स्वयं एक व्यवस्था बन जाता है—एक ऐसी व्यवस्था जो बच्चों के भीतर सोच, साहस और संवेदना का निर्माण करती है।
एक टूटी मेज, एक खाली दीवार, और कुछ जिज्ञासु आँखें—बस इतना ही काफी है, अगर शिक्षक जाग्रत है। क्योंकि असली बदलाव साधनों से नहीं, संकल्प से आता है।
यह समय बहाने गिनाने का नहीं, अपनी शक्ति पहचानने का है। यह समय यह याद करने का है कि हर शिक्षक के भीतर एक हनुमान है—जो यदि जाग जाए, तो वह शिक्षा को केवल एक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक आंदोलन बना सकता है। और जिस दिन यह जागरण होगा, उस दिन कक्षा में केवल पाठ नहीं पढ़ाए जाएंगे, वहाँ जीवन रचा जाएगा।
प्रवीण त्रिवेदी

मस्तिष्क दो हिस्सों में बँटा होता है




 हमारे सिर के अंदर मस्तिष्क दो हिस्सों (Left और Right Hemispheres) में बँटा होता है। कॉर्पस कैलोसम इन दोनों के बीच एक 'सुपर-हाईवे' या पुल की तरह है। इसका काम दोनों तरफ की जानकारियों को एक-दूसरे तक पहुँचाना है।

बायाँ हिस्सा : यह एक 'मैनेजर' की तरह है। इसे आंकड़े, भाषा, गणित, तर्क (Logic) और चीज़ों को क्रम में रखना पसंद है।
दायाँ हिस्सा : यह एक 'कलाकार' की तरह है। इसे कल्पना, संगीत, भावनाएं, और बड़ी तस्वीर देखना पसंद है।
आज के समय में हमारी पढ़ाई का ज़्यादातर ज़ोर 'बाएँ मस्तिष्क' पर होता है—जैसे रटना, परीक्षा पास करना और लॉजिक लगाना। लेख यह कहता है कि हम अक्सर इन दोनों हिस्सों को अलग-अलग इस्तेमाल करते हैं, जिससे हमारी सोच अधूरी रह जाती है।
जब ये दोनों हिस्से एक साथ काम करते हैं, तो क्या होता है?
लॉजिक + विज़न = पूर्ण जागरूकता
अगर आपके पास सिर्फ लॉजिक (बायाँ हिस्सा) है, तो आप मशीन की तरह काम करेंगे। आपके पास जानकारी तो होगी, लेकिन उसका उद्देश्य नहीं पता होगा।
अगर आपके पास सिर्फ विज़न/अंतर्ज्ञान (दायाँ हिस्सा) है, तो आपके पास बड़े सपने तो होंगे, लेकिन उन्हें सच करने का कोई प्लान नहीं होगा।
जब ये मिलते हैं,गहरी समझ:आप सिर्फ यह नहीं जानते कि "क्या" हो रहा है, बल्कि यह भी समझते हैं कि "क्यों" और "कैसे" हो रहा है।
समस्या का समाधान: आप तर्क से डेटा देखते हैं और कल्पना से एक नया रास्ता खोजते हैं।
संतुलन:प्राचीन सभ्यताओं (जैसे योग या दर्शन में) इसे ही 'जागरूकता की उच्च स्थिति' कहा गया है। जहाँ ज्ञान (Knowledge) और समझ (Wisdom) एक हो जाते हैं।
मनुष्य केवल एक 'कैलकुलेटर' या सिर्फ एक 'सपना देखने वाला' नहीं है। हमारी असली ताकत तब निखरती है जब हम तर्क (Logic) को भावना और कल्पना (Intuition)के साथ जोड़ देते हैं। यह "विपरीत चीज़ों का मिलन" ही हमें एक साधारण मनुष्य से एक जागरूक मनुष्य बनाता है।
इसी विषय से संबंधित उपनिषदों में वचन मिलते हैं।
अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते।
ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायां रताः ॥९॥
(ईसावास्योपनिषद)
जो अविद्या की उपासना की उपासना करते हैं,वे अंधेरे में जाते हैं।जो विद्या की उपासना करते हैं,वे घोर अंधेरे में जाते हैं। ।
जो केवल सांसारिक कर्म/अविद्या (भौतिकता) में लगे हैं, वे अंधकार में जाते हैं,(अनुभव तो करते हैं लेकिन कार्य कारण परिणाम को नहीं जानते हैं)।जो केवल विद्या (सैद्धांतिक ज्ञान/अहंकार) में रमे हैं, वे उससे भी अधिक गहरे अंधकार में जाते हैं,(जो कार्य कारण और परिणाम को तो जानते हैं लेकिन अनुभव और अनूभूति जन्य ज्ञान से रहित होते हैं)।
अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽसम्भूतिमुपासते।
ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्यां रताः ॥१२॥
(ईसावास्योपनिषद)
अर्थ: जो अव्यक्त प्रकृति (असम्भूति) की उपासना करते हैं, वे घोर अंधकार में जाते हैं। जो कार्य-ब्रह्म (सम्भूति - भौतिक सृष्टि) में ही रमे रहते हैं, वे और भी अधिक घोर अंधकार में प्रवेश करते हैं।
योग में इसीलिए संतुलन को बहुत महत्व दिया गया है। भैरव तंत्र सूत्र में शिव जी कहते हैं कि दो विपरीत के मध्य सत्य छिपा होता है। जिसे जान लेने से ज्ञान होता है। इसीलिए संध्या वंदन की विधियां ऋषियों ने बताईं थीं। संध्या का अर्थ है संधिकाल, जहां रात्रि जा रही है दिवस आ रहा है उसके ठीक मध्य में सूर्योदय कालीन संध्या।दिवस जा रहा है रात्रि आ रही है उसके ठीक मध्य में सूर्यास्त कालीन संध्या।जो दो विपरीत के मध्य सत्य को देख लेता है वह प्रज्ञावान हो जाता है।
किसी विषय को केवल शब्दों से नहीं समझा जा सकता है। उसके लिए भावार्थ भी समझना होता है।साथ ही उसका उद्देश्य क्या है? निहितार्थ भी समझना होता है।तब कहीं कोई विषय समझ में आता है।

#Panchkosh The first stage of child development 0 to 7 years annamaykosh

  



#NEP20 has recommended to design the curriculum based on #Panchkosh The first stage of child development 0 to 7 years is all about physical development the annamayya kosh, the development of the earth element. The preschools work more on the sensory development than the physical growth.
In these years following yam niyam and asan (the first three steps of ashtang yog) are enough. The activities for these children must be based on these three steps. Cleanliness, discipline and posture important aspects of child development.
Asan....sitting squatted on a mat or durrie will help a lot to build earth element and balanced posture where as modern parents and schools make them sit on the plastic chairs. Weak earth element means weak mooladhar chakra, that leads to lack of confidence....
Bakhal PreSchool Curriculum Researchers Pvt Ltd observes very closely to design the curriculum which helps the child to grow at the natural pace.
What's the hurry, why are we rushing and damaging the child's natural growth.
कुछ भी चलता है, कुछ भी। तीन साल के बच्चे को प्राणायाम सिखाकर उसके जीवन के आयाम बदल दो प्राकृतिक को अप्राकृतिक कर दो। फिर कह दो कलयुग के बच्चे हैं।

उच्चारण

 प्रणाम,

उच्चारण (सही तरीके से बोलना) न केवल भाषा को स्पष्ट और समझने योग्य बनाता है, बल्कि यह आंतरिक ऊर्जा और उत्तम न्यूरल नेटवर्क को उत्तेजित कर कंपन स्पंदन पैदा करता है जो तरंग बन ब्रह्माण्डीय ऊर्जाओं के साथ तारतम्य स्थापित करता है।
जितना स्पष्ट उच्चारण होगा तरंग उतनी ही प्रभावशाली होगी और उतना ही प्रभावशाली व्यक्तित्व होगा।
संगीत में यदि एक स्वर भी ऊपर नीचे हो जाए तो बेसुरा हो जाता है उसी प्रकार बोलते समय यदि एक अक्षर का उच्चारण भी स्पष्ट न हो तो वार्तालाप या संवाद में अधिक अंतर नहीं पड़ता परंतु तरंग में अंतर पड़ जाता है। आपकी बात प्रभावशाली नहीं रहती है। भाव और अर्थ की स्पष्टता: सही और स्पष्ट उच्चारण से संवाद बेहतर होता है और अर्थ का अनर्थ होने से बचता है। यह श्रोता को वक्ता के संदेश से सीधे जोड़ता है।
वेदों और शास्त्रों में मंत्रों के सटीक उच्चारण पर बहुत जोर दिया गया है, क्योंकि इनकी ध्वनि तरंगें वातावरण और साधक के भीतर एक दिव्य आभामंडल तैयार करती हैं।
हम उस युग में जी रहे हैं जहां हमारी वाणी, भाषा , शब्द, अक्षर सभी मंत्र समान कार्य कर रही हैं। यदि हमारे सामान्य बोलचाल की भाषा में भी उच्चारण स्पष्ट हो तो बिना प्रयास के सहजता से पूर्ण व्यक्तित्व विकास संभव है।
उच्चारण की महिमा को जानते समझते हुए प्रसंग वशिष्ठ चेरिटेबल ट्रस्ट के सहयोग से बाखल प्री स्कूल करिकुलम रिसर्चर्स प्राइवेट लिमिटेड ऑनलाइन कक्षा आयोजित करने जा रहा है।
सिलेबस रहेगा : ध्वनि, अक्षर, शब्द ।
कक्षा सभी आयु वर्ग के लिये उपयोगी है।
आयोजक
रेणु वशिष्ठ
मैनेजिंग ट्रस्टी प्रसंग वशिष्ठ चेरिटेबल ट्रस्ट
निदेशक बाखल प्री स्कूल करिकुलम रिसर्चर्स प्राइवेट लिमिटेड

प्रकृति अखंड है

 

https://www.facebook.com/reel/3399281580250369


शिव कृपा करो,
शिव आज्ञा दो,
शिवाग्नि प्रवाहित हो।
प्रणाम 🙏
यह तो आधुनिक विज्ञान की (fragmented)रिपोर्ट है, क्योंकि आधुनिक विज्ञान खंड खंड करके शोध कर रहा है । जबकि प्रकृति अखंड है।यदि प्रकृति के प्राकृतिक स्वरूप के आधार पर जानने का प्रयास करें जहां प्रकृति का हरेक कण अंतर्निर्भर(interdependent) है।
हममें से अधिकतर को यह मालूम नहीं होगा कि चंद्रमा फलों में रस भरता है, औषधियों में, जड़ी बूटियों में औषधि तत्व बनाने का कार्य करता है। चंद्रमा और जल तत्व का संबंध हम सभी को मालूम है जो हमें ज्वार भाटा के रूप में छोटी कक्षाओं में पढ़ाया जाता है।
रस जल ही है, जल रस ही है। पेड़ों की जड़ों से जल ऊपर जाता परंतु पेड़ की मैकेनिज्म के साथ साथ जल को ऊपर खींचने में सूर्य और चंद्रमा का भी बहुत बड़ा योगदान है। दिन में सूर्य अपनी गर्मी से जल ऊपर खींचता है और रात में चंद्रमा जल को फलों में रस में परिवर्तित करता है। नारियल के पानी को औषधीय गुण देने का कार्य चंद्रमा ने किया। हर प्रक्रिया में पांचों तत्त्व और नवग्रहों का योगदान होता ही है।
पृथ्वी पर कोई भी वनस्पति ऐसी नहीं जिसमें औषधीय गुण ना हो, यहां तक कि खरपतवार भी, जिन्हें हम जानकारी के अभाव में उखाड़कर फेंक देते हैं।
जैसे कॉलोनाइजर्स नई नई आवासीय योजनाएं लेकर आते हैं वैसे ही सृष्टिके रचयिता ने पृथ्वी पर इस संसार की रचना की। जैसे कॉलोनाइजर्स सोसाइटी में पेड़ पौधे बगीचा आदि लगाने के लिए horticuluturist की मदद लेते है,
A horticulturist is a professional who applies the art and science of plant cultivation to grow, develop, and improve fruits, vegetables, flowers, and ornamental plants. They blend scientific principles with practical gardening to increase crop yields, improve nutritional value, and enhance plant resistance to disease. वैसे ही रावण को पृथ्वी पर भेजा गया वनस्पति जगत को रचने के लिए, रावण ने एक एक वनस्पति को वेधशाला में बनाया या कहे प्रयोग करके देखा जा, जाँचा, परखा, निरीक्षण परीक्षण किया, जो भी पृथ्वी के जीव जंतुओं, प्राणियों के लिए उपयोगी वनस्पति नहीं थी उसने उसे पृथ्वी पर रहने ही नहीं दिया। कितना अद्भुत है यह सब जानना समझना। हम रावण के पुतले जलाते रहते हैं हमारे अल्प ज्ञान के कारण।
Google करके इस फैक्ट को वेरिफाई करने की कोशिश करेंगे तो शायद आपको उत्तर नहीं मिलेगा क्योंकि गूगल पर आधी अधूरी जानकारी उपलब्ध रहती है। यदि हम इधर इस विषय पर चर्चा कर रहें हैं तो AI सतर्क हो जाएगा और जानकारी इक्कठी करने लगेगा। परंतु ये सब पढ़ने के बाद कितने लोग अपनी उत्सुकता को बढ़ाएंगे इस जानकारी के सत्य को अपने सत्य से उजागर करने का प्रयास करेंगे।
हम रावण का धन्यवाद करें। 🙏🙏हम सृष्टि के रचयिता से अनुगृहीत रहें। हमें अपनी लीला का अंश बनाया।
अपने role को पूर्ण भाव से निभायें। आप सूर्य का तेज है या चंद्रमा का रस आपका हर हाव भाव कुछ बना रहा है, कुछ बिगाड़ रहा है, फिर से कुछ बना रहा है। बीज से फल और फल में फिर से बीज। बनते बिगड़ते, बिगड़ते बनते रहो।
सत्यम शिवम सुंदरम तभी मिलेगा।
बस एक बात का ध्यान रखें, सदी के महासंदेश सत्य से प्रेम, प्रेम से कर्म करें।
प्रसंग प्रणाम से प्रणव तक सत्य की विजय यात्रा में भाग लें।
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Be 'PRASANG' Be Joyous
रेणु वशिष्ठ
मेरी काया मेरी वेधशाला से
बुधवार 10 जून 2026
प्रातः 7.32

मृदा से जुड़े बच्चों के लिए कुछ आसान खेल

 

योग दिवस आ रहा है तो किसी भी एक्टिविटी के आगे Yog लगा दो बस नाम को काम हो गया।
एक किसी प्री स्कूल का वीडियो अभी अभी देखा, उत्सुकता वश पूरा देखा कि Yog in Mud क्या होता है? कैसे होता है? योग का य भी दिखाई नहीं दिया , बच्चे सिर्फ कीचड़ (mud) में उछल कूद कर रहे थे। मिट्टी में सने हाथों से हाथ की छाप भी काग़ज़ पर लगवाई गई। हां बोर्ड पर अवश्य लिखा था 'Yog in Mud'
निसंदेह,मिट्टी में खेलना बहुत अच्छी गतिविधि है। उसको सिर्फ mud play भी कहा जा सकता है।
मैने नीचे आपकी सहायतार्थ कुछ मिट्टी के खेल लिखे हैं। कोई भी बच्चों के साथ स्वयं भी खेल सकता है।
कुछ दोहे भी बच्चों को साथ साथ सिखा सकते हैं:-
मिट्टी हमारी संस्कृति, जीवन और संस्कारों का आधार है। मिट्टी पर कबीर दास जैसे महान संतों से लेकर कई कवियों ने खूबसूरत दोहे लिखे हैं। ये दोहे मिट्टी की महिमा, इंसान के उससे जुड़े रिश्ते और उसके महत्व को बताते हैं।
कबीर दास जी का दोहा:माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोहे।एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूंगी तोहे॥
धरती और इंसान का रिश्ता:-माटी से उपजे फसल, भरे सभी का पेट।मिले इसी से जिंदगी, माटी को मत मेट॥
मिट्टी की महिमा:-
मिट्टी से ही बन बना, काया का यह रूप।मिट्टी में ही मिल गया, राजा हो या भूप॥
किसान और माटी:-
समझ किसान कुम्हार ने, इस मिट्टी का मोल।लोट-पोट इस में रहे, जी भर किया किलोल॥
मिट्टी का अनमोल मोल:-
मिट्टी तो अनमोल है, मत कह इस को धूल।कण-कण इसका ही बने, हर जीवन का मूल॥
बच्चों के लिए मिट्टी या मृदा से जुड़े खेल (Soil Play) उनके शारीरिक और मानसिक विकास के लिए बेहद फायदेमंद हैं। इनसे बच्चों की रचनात्मकता (creativity) बढ़ती है, हाथ और आंखों का तालमेल बेहतर होता है, और उन्हें प्रकृति को समझने में मदद मिलती है।

मृदा से जुड़े बच्चों के लिए कुछ आसान खेल :
*रचनात्मक और कलात्मक खेल मिट्टी की मूर्तियां:-*
बच्चों को गीली मिट्टी देकर खिलौने, जानवर या बर्तन बनाने दें।
*मिट्टी से चित्रकारी:-*
मिट्टी में थोड़ा पानी मिलाकर रंग बनाएं और ब्रश या उंगलियों से कागज़ पर पेंटिंग करे।
*छाप बनाना:-*
गीली मिट्टी को चपटा करके उस पर पत्तों या फूलों को दबाएं और सुंदर डिज़ाइन बनाएं।
*शैक्षिक खेल (Educational Games)मिट्टी की परतें:-*
बच्चों को कांच के जार में मिट्टी, रेत और पानी डालकर अलग-अलग परतें (Soil Layers) बनाना सिखाए।
*कीड़े-मकौड़ों की खोज:-*
बच्चों को मिट्टी खोदकर केंचुए या छोटे कीड़े ढूंढने का काम दें, इससे वे जीव-विज्ञान सीखेंगे।
*कीचड़ की दौड़:-*
घर के बाहर बारिश के मौसम में कीचड़ में बच्चों को कूदने दें, इससे उनकी मांसपेशियां मजबूत होती हैं।
*बागवानी के खेल पौधे लगाना* :- बच्चों को मिट्टी में छोटे बीज बोना और उनमें पानी डालना सिखाएं।
*मिट्टी का घर:-* बगीचे में पत्थरों और टहनियों की मदद से मिट्टी का छोटा सा घर या किला बनाएं।
*मिट्टी के लड्डू बनाना*
*मिट्टी के ढेलों से मूर्ति बनाना*
आदि बहुत से खेल बच्चों के पृथ्वी तत्व को पोषित करते है। जिससे उनमें आत्मविश्वास और निडरता का भाव विकसित होता है।