Saturday, June 13, 2026

 




जब शिक्षा केवल किताबों के पन्नों में सिमट जाती है, तो वह दिमाग को भरती है, लेकिन आत्मा को खाली छोड़ देती है। सूचनाओं का बोझ बढ़ता है, पर विचार और संवेदना सिकुड़ने लगते हैं। ऐसे समय में कक्षा केवल एक औपचारिकता बन जाती है—जहाँ उपस्थिति दर्ज होती है, पर जागृति नहीं होती। और यहीं से शुरू होती है एक शिक्षक की असली परीक्षा—वह तय करता है कि वह पाठ्यक्रम का प्रहरी बनेगा या परिवर्तन का प्रणेता।
यही वह बिंदु है जहाँ शिक्षक का रूप साधारण से असाधारण हो जाता है—जहाँ वह अपने भीतर छिपे “हनुमान” को पहचानता है। वह हनुमान, जो अपनी शक्ति से अनजान रहता है, जब तक उसे उसका बोध न कराया जाए। ठीक वैसे ही, एक शिक्षक भी अक्सर अपनी ही भूमिका की विराटता को कम आंकता है। लेकिन जैसे ही उसे अपने प्रभाव, अपनी जिम्मेदारी और अपनी क्षमता का अहसास होता है, वह केवल पढ़ाने वाला नहीं रहता—वह संजीवनी लाने वाला बन जाता है।
समस्याएँ हर युग में रही हैं—संसाधनों की कमी, व्यवस्थागत दबाव, समय की पाबंदियाँ—पर इन सबसे बड़ा संकट तब पैदा होता है जब शिक्षक अपने भीतर के उस हनुमान को सोए रहने देता है। क्योंकि असली बाधा बाहर नहीं, भीतर होती है। जब शिक्षक खुद को सीमित मान लेता है, तभी शिक्षा सीमित हो जाती है।
एक जाग्रत शिक्षक हनुमान की तरह ही कार्य करता है—वह अपने विद्यार्थियों के लिए असंभव को संभव बनाने की जिद रखता है। वह हर बच्चे में संभावनाओं का पर्वत देखता है और खुद वह शक्ति बनता है जो उस पर्वत को उठा सके। वह बच्चों के भीतर आत्मविश्वास की संजीवनी भरता है, उनके भय को दूर करता है, और उन्हें यह विश्वास दिलाता है कि वे केवल अंक लाने के लिए नहीं, बल्कि जीवन गढ़ने के लिए यहाँ हैं।
वह आदेश नहीं देता, प्रेरित करता है। वह डर नहीं पैदा करता, साहस जगाता है। वह केवल उत्तर नहीं देता, प्रश्न करने की आग पैदा करता है। यही वह क्षण होता है जब कक्षा एक कमरा नहीं रहती, वह एक कर्मभूमि बन जाती है—जहाँ शिक्षक और छात्र मिलकर सीखने का एक जीवंत संसार रचते हैं।
आज आवश्यकता इस बात की नहीं है कि हम शिक्षा की कमियों पर विलाप करें, बल्कि इस बात की है कि हम अपने भीतर झाँकें और उस शक्ति को पहचानें, जो हर शिक्षक में निहित है। एक शिक्षक जब अपने “हनुमान स्वरूप” को पहचान लेता है, तो वह किसी नीति, किसी संसाधन, किसी व्यवस्था का मोहताज नहीं रहता। वह स्वयं एक व्यवस्था बन जाता है—एक ऐसी व्यवस्था जो बच्चों के भीतर सोच, साहस और संवेदना का निर्माण करती है।
एक टूटी मेज, एक खाली दीवार, और कुछ जिज्ञासु आँखें—बस इतना ही काफी है, अगर शिक्षक जाग्रत है। क्योंकि असली बदलाव साधनों से नहीं, संकल्प से आता है।
यह समय बहाने गिनाने का नहीं, अपनी शक्ति पहचानने का है। यह समय यह याद करने का है कि हर शिक्षक के भीतर एक हनुमान है—जो यदि जाग जाए, तो वह शिक्षा को केवल एक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक आंदोलन बना सकता है। और जिस दिन यह जागरण होगा, उस दिन कक्षा में केवल पाठ नहीं पढ़ाए जाएंगे, वहाँ जीवन रचा जाएगा।
प्रवीण त्रिवेदी

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