Tuesday, November 3, 2026

नटखट तितली और फूलों की महक

 




*तितली तितली*
आओ आओ तितली पकड़ें,
आहा! आहा! तितली पकड़ें।
रंग बिरंगी कैसी तितली,
कैसी तितली रंग बिरंगी।
भागो भागो चकाचौंध है,
रंग बिरंगी रूप सुनहरी,
कैसे मुझको चकमा दे जाए,
पकड़ ना पाऊं, फिर फिर उड़ जाए।
तितली तितली पकड़ो तितली,
आओ आओ पकड़े तितली।
जो देखे वो खुश हो जाए,
ऐसी प्यारी तितली तितली।
दबे पांव जब पीछे पहुंचे,
हाथ बढ़ाकर पंख जो पकड़े,
इधर से निकली, उधर से खिसकी,
ऐसी प्यारी तितली तितली।
उछाल कूद कुछ ऐसी कराई
इस क्यारी से उस क्यारी तक,
फूल फूल पर जा इतराई,
हम मंडराए तितली तितली,
मस्त बना गई हमको तितली।
तितली पीछे जंगल पहुंचे,
छूट गए सब मंदिर मस्जिद,
मिल गये हमको बिल्ली बंदर,
तितली तितली, इधर से निकली,
उधर से खिसकी।
मेढक आया टर्र टर्र करता,
कुट कुट करती गिलहरी आई,
खरगोश ने छलांग लगाई,
कछुआ दौड़े मधम मद्धम।
तितली तितली
केंचुआ भी रेंगता आया,
स्नेल अपना घर साथ लाई,
कोई हमको नहीं है भाया,
तितली पर ही मन है आया।
तितली तितली
तितली संग हम दौड़े भागे
फूल फूल पर हम मंडराए।
थक गए भैया हम तो देखो,
पकड़ ना पाए , उड़ गई तितली।
हम फूलों की सुगंध ले आए।
आहा! आहा!सुगंध ले आए।
रेणु वशिष्ठ
679 शांतनु पथ विद्युत नगर A
अजमेर रोड जयपुर 302021
स्वरचित मौलिक रचना

बाल-मन की मासूमियत, चंचलता और प्रकृति के आंचल में दौड़ते-भागते बच्चों की एक बहुत ही सुंदर और प्यारी कहानी है:

तितली और चंचल कदम

एक सुनहरी धूप वाली सुबह थी। चारों ओर खिले हुए सुंदर फूलों पर रंग-बिरंगे फूलों की महक छाई थी। तभी वहाँ एक बहुत ही प्यारी, रंग-बिरंगी और सुनहरी रूप वाली तितली उड़ती हुई आई। उसके पंखों के रंग ऐसे थे कि जो भी उसे देखता, उसका मन खुशी से झूम उठता।

दो छोटे-छोटे बच्चे, जिनकी आँखें उत्सुकता से चमक रही थीं, उस तितली को देखकर चहक उठे— "अरे देखो! तितली! आओ-आओ, तितली पकड़ें!"

वे दोनों हँसते-भागते उसके पीछे हो लिए। तितली भी बड़ी नटखट थी। वह उन्हें ऐसा चकमा देती कि जैसे ही बच्चे दबे पाँव धीरे-धीरे पीछे पहुँचकर अपने नन्हे हाथ उसके पंख पकड़ने के लिए बढ़ाते, तितली "फुर्र" से इधर से निकलकर उधर खिसक जाती!

कभी वह इस क्यारी के फूल पर बैठती, तो कभी उस क्यारी पर इतराती हुई फुदक जाती। उसने बच्चों को इस क्यारी से उस क्यारी तक ऐसी उछल-कूद कराई कि वे थकने के बावजूद मजे से उसके पीछे-पीछे मंडराते रहे। तितली ने तो उन बच्चों को बिल्कुल मस्त ही कर दिया था!

भागते-भागते तितली के पीछे-पीछे वे बच्चे गाँव या मोहल्ले के एक छोटे से जंगल और बाग़ की तरफ पहुँच गए। वहाँ पहुँचते ही पीछे मंदिर और मस्जिद छूट गए, और रास्ते में उन्हें नए-नए प्यारे दोस्त मिल गए। टर्र-टर्र करता हुआ एक मेंढक आ गया, कुट-कुट करती गिलहरी फुदक उड़ी, एक खरगोश ने लंबी छलांग लगाई, तो कछुआ मद्धम-मद्धम अपनी चाल से चलने लगा। केंचुआ भी धीरे-धीरे रेंगता हुआ आ गया और अपना छोटा सा घर साथ लिए हुए एक स्नेल (घोंघा) भी वहाँ आ निकला।

लेकिन बच्चों का मन तो इन सब पर आया ही नहीं! उन्हें तो बस अपनी वही प्यारी तितली भा रही थी। वे चिल्लाए— "तितली तितली! कोई हमको नहीं भाया, हमारा मन तो बस तितली पर ही आया है!"

तितली के संग-संग वे बच्चे भी खूब दौड़े-भागे और हर फूल पर उसके साथ मंडराते रहे। आखिर में, दौड़ते-दौड़ते वे बुरी तरह थक गए। भौंचक्के होकर उन्होंने देखा कि तितली तो हाथ आई ही नहीं, और वह उड़कर आसमान में दूर निकल गई।

तितली भले ही हाथ नहीं आई, लेकिन जब वे बच्चे अपने घर लौटे, तो उनके छोटे-छोटे नन्हे मन और कपड़े फूलों की भीनी-भीनी खुशबू और प्रकृति की अनमोल सुगंध से महक रहे थे। वे खुशी से बोल उठे— "अरे वाह! तितली हाथ न सही, पर हम फूलों की प्यारी सुगंध तो ज़रूर ले आए!"

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