Saturday, June 13, 2026

आलू-परवल कैसे उछलते हैं?

 

एक पतीली में आलू और परवल उबलते हैं। नीचे अंगीठी जल रही है। एक बालक आकर देखता है तो बड़ी आश्चर्यदृष्टि से कहता है, माँ देखो आलू-परवल कैसे उछलते हैं! माँ अंगीठी बुझा देती है। आलू-परवल अब स्थिर रह जाते हैं। बालक पूछता है, माँ आलू-परवल अ​ब क्यों नहीं उछलते? माँ कहती है, वो पहले भी अपनी शक्ति से नहीं उछलते थे, पतीली के नीचे अंगीठी की जो तापशक्ति है, उससे उछलते थे। अंगीठी के बुझते ही वो निष्प्राण रह जाते हैं।

Children are born curious, and how adults respond to this instinct shapes their future. Satiating this curiosity well turns learning into a joyful, lifelong habit. In contrast, ignoring or shutting down their questions can cause them to lose this natural drive.

Prasang Vashistha Charitable Trust and Bakhal Preschool curriculum developers ask to intricately weave the inner and outer world in your response , only the awakened adults can do it.
Inner and outer worlds both reciprocate well and resonate in each other, it's a pure science.
To enhance your vision, join our mission to awaken every teacher. Abreast with the need of the hour.
Knowledge Economy vs Wisdom Economy
Train not , Expand the mind.
See less

ऊर्जा बाहर की ओर बहती है या भीतर की ओर उतरती है


 शिव कृपा करो,

शिव आज्ञा दो,

शिवाग्नि प्रवाहित हो।

प्रणाम,
मनुष्य के भीतर जितनी ऊर्जा होती है, वह या तोबाहर की ओर बहती है या भीतर की ओर उतरती है। बाहर की ओर बहती है तो संसार बनाती है, महत्वाकांक्षाएँ बनाती है, इच्छाएँ बनाती है, भोग बनाती है। 
यदि यम, नियम, आसान, प्राणायाम और प्रत्याहार द्वारा भीतर की ओर मुड़ती है तो वही ऊर्जा धारणा,ध्यान बन जाती है, अंततः समाधि बन जाती है, आत्मबोध का माध्यम बन जाती है।
समस्या यह नहीं है कि मनुष्य के पास ऊर्जा नहीं है। समस्या यह है कि जो ऊर्जा उसे भीतर ले जा सकती थी, वही अधिकांशतः इंद्रियसुखों, चिंताओं, प्रतिस्पर्धाओं, क्रोध, ईर्ष्या और वासनाओं में खर्च हो जाती है। जब तक मनुष्य को इसका बोध होता है, तब तक जीवन की डांवाडोल हो चुका होता है।
यही जीवन की सबसे बड़ी विडंबना है।
युवा अवस्था वह अवस्था है जब शरीर में बल, मन में उत्साह, संकल्प में तेज और प्राणों में प्रचुरता होती है। युवा मन को संसार भी उसी आकर्षित करता है। संसार का आकर्षण — "इस ऊर्जा को भोग में लगाता है।" 
माया के भोग साधन जुटाने में स्वयं का बोध ही नहीं रह जाता।ऊर्जा क्षय होती रहती है। यदि ऊर्जा को भोग और बोध दोनों में बराबर बराबर लगाया जाए तो दोनों सध सकते हैं।
दोनों दिशाएँ एक साथ पूरी शक्ति से नहीं चल सकतीं। तीन चौथाई ऊर्जा भीतर और एक चौथाई ऊर्जा संसार में लगाई जाए तो शांतिमय, मंगलमय जीवन की कल्पना की जा सकती है। हम एक चौथाई ऊर्जा भीतर सहेजते हैं (जो प्राकृतिक रूप से होती ही है) और तीन चौथाई ऊर्जा संसार में छोड़ते हैं। ऊर्जा का बहाव शरीर में ठहरता नहीं , क्योंकि भीतर ठहराव नहीं, स्थिरता नहीं। चंचल ऊर्जा ब्रह्मांड से आप में प्रवाहित होती है और सीधी बाहर निकल जाती है आपके दस द्वारों से। संसार का पूरा रसास्वादन, इच्छाओं की तृप्ति , धन और प्रतिष्ठा अर्जित करने के लिए।  सारा ईंधन जल जाता है और फिर निढाल होकर बैठे रहते हैं। भोग के साथ साथ बोध पर भी  ऊर्जा लगती रहे तो वही आत्मबोध  वृद्धावस्था का मनोरंजन बन जाता है।
 युवावस्था में ऊर्जा का प्रवाह तीव्र गति से होता है, उसी ऊर्जा के प्रवाह से endocrine glands activate होती हैं, हार्मोन स्रावित होते हैं। शुरू में आरंभ में ऊर्जा के प्रवाह को हर बच्चा झेल नहीं पाता और कई प्रकार की शारीरिक , मानसिक परेशानियों का सामना करता है। जो परेशानियां नहीं होती हैं उसके ऊर्जा को ग्रहण करने की प्रक्रिया का हिस्सा होती हैं।जिसे परिजन बीमारी समझकर चिता का विषय बना लेते हैं। बहुत सा बेसिरपैर का ज्ञान दे दिया जाता है। प्राचीन गुरुकुलों में बालकों को केवल शास्त्र नहीं पढ़ाए जाते थे, बल्कि जीवन की दिशा दी जाती थी। अनुशासित किया जाता था। ताकि वे भीतर से परिपक्व होकर संसार में रहते हुए भी अपने केंद्र को न भूलें।
जिस भूमि में बीज समय पर बोया जाता है, वही वृक्ष बनती है। जो बीज सूखी भूमि पर बहुत देर से डाला जाए, उसके अंकुरित होने की संभावना कम हो जाती है।
यही कारण है कि ब्रह्मचर्य को महत्व दिया जाना चाहिए।
ब्रह्मचर्य का अर्थ केवल शारीरिक संयम नहीं है। उसका वास्तविक अर्थ है — अपनी जीवनशक्ति का संरक्षण और उसका उच्चतर दिशा में रूपांतरण करना। ब्रह्मचर्य वह कला है जिसमें मनुष्य अपनी बिखरी हुई ऊर्जा को समेटता है, उसे एकाग्र करता है और उसे चेतना के उत्कर्ष में लगाता है।जिस प्रकार सूर्य की बिखरी हुई किरणें सामान्य गर्मी देती हैं, परंतु वही किरणें लेंस के माध्यम से एक बिंदु पर केंद्रित हो जाएँ तो अग्नि प्रज्वलित कर देती हैं, उसी प्रकार बिखरी हुई जीवनशक्ति केवल सामान्य जीवन जीती है, जबकि एकत्रित जीवनशक्ति आत्मबोध का द्वार खोल सकती है।
यह सत्य है कि इतिहास में कुछ ऐसे महापुरुष हुए हैं जिन्होंने सामान्य नियमों से भिन्न मार्ग अपनाकर भी उच्चतम आध्यात्मिक अवस्थाएँ प्राप्त कीं। किंतु अपवाद कभी नियम नहीं होते। उन महापुरुषों के पास जन्मजात या अर्जित रूप से प्राणशक्ति का इतना विशाल भंडार था कि वे सामान्य सीमाओं से परे जा सके। साधारण मानव को अपवादों की नहीं, सिद्धांतों की चिंता करनी चाहिए।जो व्यक्ति अपनी ऊर्जा को निरंतर इच्छाओं में खोता रहता है, वह ध्यान में स्थिर नहीं हो सकता। और जो अपनी ऊर्जा को सहेजना सीख लेता है, उसके भीतर स्वाभाविक रूप से मौन, एकाग्रता और अंतर्दृष्टि का जन्म होने लगता है।
सत्य का बीज जितना जल्दी बोया जाए, उतना अच्छा है। किशोरावस्था में बोया जाए तो वह दिशा बन जाता है। युवावस्था में बोया जाए तो वह साधना बन जाता है। और यदि वृद्धावस्था में बोया जाए तो भी उसका मूल्य है, पर तब वह संघर्ष अधिक और संभावना अपेक्षाकृत कम लेकर आता है।इसलिए यदि जीवन में कभी आत्मबोध की आकांक्षा जागे, तो उसे भविष्य पर मत टालिए। अध्यात्म उस दिन से आरंभ होता है जिस दिन मनुष्य यह समझ लेता है कि उसकी सबसे बड़ी पूँजी समय नहीं, धन नहीं, बल्कि उसकी जीवनशक्ति है।
जिसने अपनी ऊर्जा को पहचान लिया, उसने साधना का पहला द्वार खोल लिया।और जिसने अपनी ऊर्जा को संभाल लिया, उसके लिए आत्मा तक पहुँचने का मार्ग दूर नहीं रह जाता। आत्म बोध से आत्मशक्ति मिलती है, "मैं हूं ना " भीतर से आवाज गूंजती रहती है।
आप कुछ करें या ना करें , आत्मशबोध, आत्मशक्ति हेतु सदी के महासंदेश सत्य से प्रेम, प्रेम से कर्म करें।
प्रसंग प्रणाम से प्रणव तक सत्य की विजय यात्रा में भाग लें।
Look beyond imperfections 
Be 'PRASANG' Be Joyous 
रेणु वशिष्ठ 
#imbibevalues #buildcharacter #buildnation #nochildleftout #nochildleftbehind 
॥ 🙏

Wednesday, April 23, 2025




 प्रणाम,

अंत में तो अपने प्रेम में पड़ना ही होगा, संसार का प्रेम तो भुलावा है। संसार के प्रेम में कोई दूसरा चाहिए होता है, जहां दो हो गए द्वैत हो गया। द्वैत, मन बुद्धि अहंकार में डोलता है। खंड खंड रहता है, टूटा टूटा। आपस में खंड टकराते हैं । अंत में टूटते टूटते आप एक कण भर रह जाते हैं, वही कण आपका प्रकाश है , उस कण से प्रेम करें , वहीं अद्वैत की साधना शुरू हो जाती है। अखंड मंडलाकार प्रकाशित होता है। फिर कोई दूसरा नहीं होता। आप ही आप होते है, सब ही राम समाया का प्रत्यय दृष्टिगत होगा।
स्वयं से प्रेम करना निस्वार्थ होने की पहली सीढ़ी है। अधिक जानने समझने के लिए सदी के महासंदेश, सत्य से प्रेम, प्रेम से कर्म करें का अनुसरण करें।
सत्यमेव जयते
प्रसंग प्रणाम से प्रणव तक सत्य की विजय यात्रा में भाग लें।
रेणु वशिष्ठ
मेरी काया मेरी वेधशाला से
28.3.2025
नोट:- विचार व्यक्तिगत अनुभव से उद्भूत हैं, जरूरी नहीं शास्त्र सम्मत हों अतः किसी तर्क वितर्क के लिए बाध्य नहीं हैं। यदि किसी को तर्क चाहिए तो अपनी काया को वेधशाला बनाकर अनुभवात्मक निरीक्षण परीक्षण कर अपने उत्तर प्राप्त करें।

सु means शुभ, ख means स्थान = सुख

 







सु means शुभ, ख means स्थान = सुख

ब्रहमण्ड का root word वृहद means expanded.
We can observe the thousandth part of the physical world. Jis प्रकार कहते हैं आत्मा का स्वरूप एक बाल के हजारवे हिस्से के बराबर है उसी प्रकार हम अल्प BUDHHI से PHYSICAL world के हजारवें हिस्से को ही देख सकते हैं.
ईश्वर के सहस्त्रनाम लेना भी शायद इसी बात का संकेत देते है कि हजार नाम लेंगे तो हम करते करते कम से कम एक बाल बराबर तो सृष्टि के सृजन का दर्शन कर पाएंगे या समझ पाएंगे.
ये विचार सिर्फ मेरे अल्प बुधि की समझ सी व्यक्त हुए हैं.
यदि वृहत का darshan करना है to अनेकानेक लोगों से जुड़ना होगा जैसे कंकर कंकर जुड़कर पहाड़ बन जाता है. बूंद बूंद जुड़कर बादल या समुद्र बन जाता हैं..
27.5.22

परिवार बिना अस्तित्व कहां?

 

25.8.2024

प्रणाम 

आज का प्रसंग 

मैं और मेरा परिवार,

मैं हूं तो मेरा परिवार है। परिवार है तो मैं हूं। परिवार बिना अस्तित्व कहां?

करता था विचरण, यूं ही, इधर उधर, स्वच्छंद, खिलंदड़, लिए अपनी ज्योति। अपने साथ मिल जाए कोई दीपक कोई बाती तो ज्योत बन अपने प्रकाश से तज दूं अंधकार समस्त।

अपनी ज्योत को सघन किया स्थिर हुआ।इक दीपक इक बाती धरा पर तैयार हुआ।

दो परिवार मिल लाए इक दीपक इक बाती। आनंदित परिवार, आनंदित दीपक बाती।

प्रेमर्पण की ऊर्जा ने चास दी बाती।

ज्योत से ज्योत जग गई।

ज्योत को मिला परिवार, भाई बहिन का प्यार।

जगमग जगमग करते सभी पिता सूर्य तो मत धरती, भाई मेरे राजकुमार से बुध।

ग्रह नक्षत्र से चारों ओर। सौर मंडल सा मेरा परिवार। प्रक्रिया बढ़ती गई, एक से अनेक सौर मंडल बन गए। सभी के अपने अपने मंडल, अपने अपने पथ।

सभी ज्योत अस्तित्व आई तो निराकार से आकार ले लिया, आकाश से धरा पर रूप धरा। सघन हुई अपने आस्तित्व को अपनी सघनता के आवरण में ढक लिया। दीपक बाती का रूप लिया। माता पिता बनी। ज्योत से ज्योत जगती गई। कभी दीपक कभी बाती और कभी ज्योत।

ज्योत कभी जड़ तो कभी चेतन कायखेल खेलती ही रहती है, शब्द, रूप,रस,गंध,स्पर्श के पांच तत्वों से पंच कोषों, सप्त धातुओं आदि आदि में नटराज बन नृत्य करती ज्योत।

सत्यम शिवम सुंदरम का प्रत्यक्षीकरण करती ज्योत।

आज के प्रसंग पर आते हैं 

हम सभी किसी ना किसी परिवार की सिर्फ एक इकाई मात्र हैं।उस इकाई को हम मै ही मैं का रूप दे अहंकारी हो जाएं तो आपकी ज्योति ज्वाला बन  आपको भस्म करती है।

अहंकार को गलाकर रज कण (रेणु)भर अपनी ज्योत के ले तो आप विराट के साथ एकाकार होने की प्रक्रिया में अग्रसर होने लगते हैं। परिवार के सभी सदस्यों को मान सम्मान दें। सूर्य तो अपने तेज से अपने सौर परिवार के सदस्यों को भस्म नहीं करता।सभी को प्रकाशित करता है।

अपनी ज्योति को ज्वाला नहीं सूर्य सा तेज दें। प्रकाश दें, प्रकाशित करें हो।

यदि ऐसा नहीं करते तो क्या करते है?

परिवार का विघटन।

पहले खुद टूटते है (ये जानते नहीं) बिखर कर बड़ा नहीं हुआ जाता ये समझते नहीं।

ज्योति ज्वाला बनती है, बाहर निकलती ही, दीवारें तोड़ती हैं, बंद दरवाजों के ताले तोड़ती है, संकीर्ण होती जाती है, परिवार को रोशन कर रहीं नई ज्योतियों को फूंक मारती है, और ना जाने क्या क्या?

व्यक्ति से परिवार, परिवार से समाज, समाज से देश, देश से संसार, संसार से भूमंडल, भूमंडल से उच्च सात लोक भू, भुवस, स्वर, महा, जन, टैप्स और सत्य।

भूमंडल से नीचे अतल, प्राण, सुतल, रसातल, तलातल, महातल, पाताल और नरक। पुराणों और अथर्ववेद में बताए गए।

सभी लोकों में ज्योत अपने दीपक बाती का चुनाव कर सकती है।

भूलोक में हमने परिवार का चुनाव किया है। हम जिस भी परिवार में हैं हमारा ही चुनाव है। आगे किस लोक में जाना है अपनी ज्योत को स्थिर करें और विचार करें।सबसे उच्च लोक सत्य है और सबसे निम्न लोक नर्क।

समय रहते सही चुनाव कर ले जाने कब अगला परिवार, लोक, आपको बुला ले।

सदी के महा संदेश, सत्य से प्रेम, प्रेम से कर्म करे।

श्रमेव जयते 

सत्यमेव जयते 

प्रसंग प्रणाम से प्रणव तक सत्य की विजय यात्रा में भाग लें।

25.8.24